Guru Pradosh Vrat Puja: भगवान शिव की आराधना के लिए प्रदोष व्रत को विशेष फलदायी माना जाता है। यह व्रत हर महीने शुक्ल और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर रखा जाता है। जब त्रयोदशी का व्रत गुरुवार को आता है, तो इसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जाता है। आज 24 सितंबर को भाद्रपद मास का अंतिम प्रदोष व्रत है। प्रदोष व्रत रखने वाले श्रद्धालु सुबह से ही भगवान शिव की पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों में जुटे हुए हैं। हालांकि इस व्रत में शाम के समय की जाने वाली शिव पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। भक्त भगवान भोलेनाथ को जल, बेलपत्र, फूल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित कर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
आरती के बिना अधूरी मानी जाती है पूजा
सनातन परंपरा में पूजा के अंत में आरती करने की परंपरा रही है। मान्यता है कि आरती के जरिए भक्त अपने आराध्य के प्रति कृतज्ञता और भक्ति प्रकट करते हैं। इसी वजह से प्रदोष व्रत की पूजा पूरी करने के बाद भगवान शिव की आरती करने का विधान बताया गया है। अगर आपने भी आज गुरु प्रदोष का व्रत रखा है, तो शिव पूजन के बाद श्रद्धा के साथ आरती कर सकते हैं।
भगवान शिव की आरती
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा।
एकानन चतुरानन पंचानन राजे,
हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥
ॐ जय शिव ओंकारा।
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे,
त्रिगुण रूप निरखते, त्रिभुवन जन मोहे॥
ॐ जय शिव ओंकारा।
अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी,
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा।
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे,
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥
ॐ जय शिव ओंकारा।
कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूल धर्ता,
जगकर्ता जगभर्ता जग संहारकर्ता॥
ॐ जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका,
प्रणवाक्षर में शोभित यह त्रिवेद का टीका॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा।
Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है loksatya इसकी पुष्टि नहीं करता है।