पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के अंदर खींचतान जारी है। इस बीच मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को लेकर भी सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। ज्ञानेश कुमार को भारत रत्न दिए जाने की मांग से जुड़ी चर्चाओं के बीच टीएमसी के बागी खेमे और नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) से जुड़े घटनाक्रम ने विवाद को नया मोड़ दिया है।
दरअसल, टीएमसी में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट और ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट के बीच पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न और संगठन पर अधिकार को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। बागी गुट ने खुद को ‘असल’ तृणमूल कांग्रेस बताते हुए चुनाव आयोग के समक्ष पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर दावा पेश किया था। इस गुट के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार समेत चुनाव आयोग के अन्य सदस्यों से मुलाकात भी की थी।
पीएम मोदी को लिखा पत्र
इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में ज्ञानेश कुमार को भारत रत्न दिए जाने की मांग भी चर्चा में है। नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया ने उन्हें भारत रत्न देने की मांग की है. नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया पार्टी ने पीएम मोदी को एक लेटर लिखा है. सितंबर के आखिरी सप्ताह में दिल्ली में कुछ सामाजिक और हिंदू संगठनों ने उनके समर्थन में प्रदर्शन कर भारत रत्न देने की मांग की। प्रदर्शनकारियों ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची को लेकर किए गए काम का हवाला दिया।
व्यंग्यात्मक अंदाज में कही
वहीं, ज्ञानेश कुमार को लेकर विपक्षी नेताओं की ओर से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने हाल ही में भारत रत्न देने की बात व्यंग्यात्मक अंदाज में कही। यह टिप्पणी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और SIR को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के संदर्भ में थी।
निर्वाचित प्रतिनिधियों का पर्याप्त समर्थन
टीएमसी विवाद की बात करें तो चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों से पार्टी के संगठन और अधिकृत हस्ताक्षरों को लेकर दावे और जवाब मांगे हैं। बागी गुट का दावा है कि उसके पास पार्टी के निर्वाचित प्रतिनिधियों का पर्याप्त समर्थन है, जबकि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट इस दावे को चुनौती देता रहा है। इस पूरे विवाद के बीच ज्ञानेश कुमार को लेकर सामने आ रही ‘भारत रत्न’ की मांग और टीएमसी के भीतर चल रही संगठनात्मक लड़ाई ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में चुनाव आयोग की भूमिका को एक बार फिर बहस के केंद्र में ला दिया है।