आधी बारिश, सूखा जून... अल नीनो ले आया देश के इतिहास का सबसे बुरा मॉनसून! : देश में इस वर्ष मॉनसून का मिजाज पूरी तरह बदला हुआ नजर आ रहा है। जून का महीना, जो आमतौर पर दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की तेज शुरुआत और किसानों के लिए राहत लेकर आता है, इस बार कई राज्यों में सूखे जैसे हालात छोड़ गया। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रशांत महासागर में सक्रिय अल नीनो प्रभाव ने बारिश के सामान्य चक्र को बुरी तरह प्रभावित किया है। इसके चलते देश के कई हिस्सों में औसत से काफी कम वर्षा दर्ज की गई, जिससे कृषि, जल संसाधन और बिजली उत्पादन पर गंभीर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है.
बारिश का असमान वितरण बना संकट
मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, कुछ क्षेत्रों में भारी वर्षा हुई, जबकि बड़े भूभाग में बारिश सामान्य से काफी कम रही। यही असमान वितरण सबसे बड़ी चिंता का विषय बन गया है। उत्तर-पश्चिम भारत, मध्य भारत और कई पूर्वी राज्यों में जून के दौरान लंबे समय तक बारिश नहीं होने से खेतों में बुवाई प्रभावित हुई। किसान धान, मक्का और दलहनी फसलों की रोपाई को लेकर चिंतित दिखाई दिए। कई जिलों में जलाशयों का स्तर भी सामान्य से नीचे पहुंच गया है.
अल नीनो ने बिगाड़ा मॉनसून का गणित
विशेषज्ञों के अनुसार, अल नीनो एक ऐसी जलवायु घटना है जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी भाग का समुद्री तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इसका प्रभाव दुनिया भर के मौसम पैटर्न पर पड़ता है। भारत में अल नीनो अक्सर कमजोर मॉनसून और कम वर्षा से जुड़ा माना जाता है। इस बार भी इसके कारण मानसूनी हवाओं की ताकत कमजोर पड़ी, जिससे कई क्षेत्रों में बादल बनने की प्रक्रिया प्रभावित हुई और बारिश अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सकी.
कृषि और अर्थव्यवस्था पर खतरे के बादल
कम वर्षा का सबसे बड़ा असर कृषि क्षेत्र पर दिखाई दे रहा है। देश की बड़ी आबादी आज भी खेती पर निर्भर है और खरीफ सीजन की सफलता मॉनसून पर टिकी रहती है। यदि जुलाई और अगस्त में भी बारिश सामान्य से कम रहती है तो खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इससे महंगाई बढ़ने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ने की आशंका भी जताई जा रही है.
आगे क्या कहता है मौसम पूर्वानुमान?
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले हफ्तों में कुछ क्षेत्रों में वर्षा की गतिविधियां बढ़ सकती हैं, लेकिन पूरे सीजन की भरपाई होना आसान नहीं होगा। सरकार और राज्य प्रशासन जल संरक्षण, सिंचाई प्रबंधन और किसानों को राहत पहुंचाने की योजनाओं पर काम कर रहे हैं। फिलहाल देश की नजरें आसमान पर टिकी हैं, क्योंकि मॉनसून की अगली चाल ही तय करेगी कि यह साल सामान्य रहेगा या इतिहास के सबसे चुनौतीपूर्ण मॉनसून वर्षों में दर्ज होगा.