
हरछठ व्रत, जिसे ललही छठ, बलराम छठ या ललही छठी भी कहा जाता है, हिंदू धर्म में विशेष रूप से माताओं द्वारा अपनी संतान की दीर्घायु, आरोग्यता और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाने वाला एक पवित्र व्रत है। यह पर्व भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है और भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बलराम जी का जन्म इसी दिन हुआ था, और उन्हें बल, कृषि और धर्म का प्रतीक माना जाता है।
उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है हरछठ का त्योहार
साल 2025 में हरछठ व्रत 15 अगस्त, शुक्रवार को मनाया जाएगा। यह दिन विशेष रूप से उत्तर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों, विशेषकर बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड में बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। व्रत की शुरुआत सुबह स्नान कर साफ-सुथरे वस्त्र पहनने और घर के आंगन या किसी पवित्र स्थान पर पूजा स्थल तैयार करने से होती है। महिलाएं इस दिन निर्जल व्रत रखती हैं और मिट्टी या गोबर से बनी ललही माता की प्रतिमा की पूजा करती हैं।
इस विधि से रखा जाता व्रत
पूजा में खीरा, दही, लड्डू, भुना चना, सत्तू, नारियल, दूब घास, अक्षत, रोली, हल्दी और फलों का विशेष रूप से उपयोग होता है। व्रत रखने वाली महिलाएं सूप या टोकरी में प्रसाद सजाकर व्रत करती हैं और शाम को कथा सुनने के बाद व्रत का पारण करती हैं। इस दिन बालकों को खीरा, दही और लड्डू खिलाकर उनके आरोग्य की कामना की जाती है।हरछठ का व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मातृत्व की भावना, संतान के प्रति प्रेम और भारतीय संस्कृति में रचे-बसे पारिवारिक मूल्यों का प्रतीक भी है। यह पर्व हमें जीवन में संयम, श्रद्धा और आस्था के महत्व का बोध कराता है। बलराम जी के बल और धैर्य की भावना को आत्मसात कर जीवन में सकारात्मकता लाने का संदेश भी हरछठ व्रत हमें देता है।