हरियाणा की सैनी सरकार इस वक्त ऐसी मुश्किल में फंसी है जहां हर फैसला जोखिम भरा दिख रहा है। एक तरफ पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का सख्त आदेश है, जिसकी समयसीमा 28 फरवरी को पूरी हो रही है। दूसरी तरफ संविदा कर्मचारियों ने 12 फरवरी को राज्य स्तरीय हड़ताल की चेतावनी दे दी है। अदालत का दबाव और कर्मचारियों का आक्रोश, दोनों एक साथ सरकार के सामने खड़े हैं। यही वजह है कि यह मामला अब सिर्फ नौकरी का नहीं रहा, बल्कि सरकार की नीतियों और फैसलों की परीक्षा बन गया है।
हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
हाईकोर्ट ने 31 दिसंबर को अपने आदेश में साफ कहा था कि लंबे समय से काम कर रहे संविदा कर्मचारियों को नियमित किया जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन कर्मचारियों ने 31 दिसंबर 2025 तक 10 साल की सेवा पूरी कर ली है, उन्हें भी पक्का किया जाना चाहिए। इसके लिए पद स्वीकृत हों या न हों, जरूरत पड़ी तो नए पद बनाए जाएं। इतना ही नहीं, नियमित होने की तारीख से पूरा वेतन और 6 प्रतिशत ब्याज देने की बात भी कही गई। इस फैसले से कर्मचारियों में उम्मीद जगी कि अब वर्षों की अनिश्चितता खत्म होगी।
सरकारी खजाने पर भारी बोझ
लेकिन इस आदेश को लागू करना सरकार के लिए आसान नहीं है। हरियाणा कौशल रोजगार निगम के जरिए काम कर रहे करीब 1 लाख 20 हजार कर्मचारी इससे जुड़े हैं। अगर सभी को नियमित किया गया तो सरकारी खजाने पर बड़ा भार पड़ेगा। इसी वजह से सरकार पूरी तरह आदेश मानने से पहले हर पहलू पर विचार कर रही है। प्रशासनिक स्तर पर भी इतने बड़े बदलाव को लागू करना एक चुनौती माना जा रहा है।
बीच का रास्ता तलाशती सरकार
दबाव के बीच सरकार ने एक वैकल्पिक रास्ता निकालने की कोशिश शुरू की है। कर्मचारियों से उनके दस्तावेज पोर्टल पर तेजी से अपलोड कराए जा रहे हैं और 58 साल की उम्र तक नौकरी की सुरक्षा देने की बात कही जा रही है। सरकार का कहना है कि इससे कर्मचारियों को स्थायित्व मिलेगा और अदालत की अवमानना से भी बचा जा सकेगा। हालांकि, इस कदम को लेकर कर्मचारियों में असमंजस बना हुआ है।
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कर्मचारी संगठनों का विरोध
कर्मचारी संगठन सरकार की इस रणनीति पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि नौकरी की सुरक्षा के नाम पर नियमितीकरण से बचने की कोशिश की जा रही है। संगठनों का आरोप है कि अगर कर्मचारी पोर्टल पर सहमति दे देते हैं तो सरकार अदालत में यह कह सकती है कि कर्मचारियों ने खुद यह व्यवस्था स्वीकार की है। इसी वजह से 12 फरवरी की हड़ताल को निर्णायक बताया जा रहा है।
आने वाले दिन होंगे निर्णायक
सैनी सरकार के सामने अब दोनों रास्ते कठिन हैं। आदेश मानने पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा, टालने पर अवमानना और आंदोलन का खतरा है। 12 फरवरी की हड़ताल और 28 फरवरी की डेडलाइन के बीच सरकार की हर चाल पर नजर है। यह लड़ाई अब नौकरी से आगे बढ़कर भरोसे की बन चुकी है। सवाल यही है कि क्या सरकार इस संकट से निकलने का ठोस रास्ता ढूंढ पाएगी या फिर यह विवाद और गहराता जाएगा।