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Nagaland 201 Rape Case : भारत में अक्सर किसी घटना के बाद ऐसी धारणा बन जाती है कि उसकी पुनरावृत्ति नहीं होगी। 2015 में नागालैंड के दीमापुर (Dimapur) में एक संदिग्ध बलात्कार के आरोप में अभियुक्त की मॉब लिंचिंग हुई थी, और इसके बाद सोशल मीडिया एवं कुछ चर्चाओं में यह दावा होने लगा कि “उस घटना के बाद से वहाँ बलात्कार नहीं हुआ।” लेकिन सरकारी आँकड़ों और समाचारों के अनुसार यह दावा गलत है.
2015 की घटना — दीमापुर मॉब लिंचिंग
क्या हुआ था: फरवरी 2015 में दीमापुर के एक कॉलेज की छात्रा ने सैय्यद फारिद (Syed Farid Khan) नामक व्यक्ति पर बलात्कार का आरोप लगाया. भीड़ ने क्या किया: मार्च की शुरुआत में लगभग कई हजार लोगों ने केंद्रीय जेल (Dimapur Central Jail) तोड़ कर अभियुक्त को जेल से निकल कर सार्वजनिक रूप से मारपीट की, नंगा किया, पत्थर मारे, और अंततः उसकी मौत हो गई.
पुलिस/सरकार की स्थिति:
शुरुआत में शिकायत दर्ज की गई थी और मेडिकल जांच समेत फोरेंसिक साक्ष्य की मांग की गई थी. बाद में राज्य सरकार ने केंद्र को बताया कि अभियुक्त ने पुलिस को बयान दिया कि यह “सहमति (consensual sex)” समस्या थी यानी कि बलात्कार नहीं हुआ. लेकिन पुलिस और समाचार एजेंसियों द्वारा यह भी कहा गया कि केस पूरी तरह खारिज नहीं हुआ है, अभी भी फोरेंसिक रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों की जांच बनी हुई है.
सजा और कार्रवाई:
जेल व केन्द्रीय शिकायत विभाग ने कई लोगों को गिरफ्तार किया. वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और जेल के कुछ जिम्मेदारों को निलंबित किया गया. एक न्यायिक जांच आयोग (judicial inquiry commission) नियुक्त किया गया ताकि घटना की गहरी जांच हो सके.
2015 के बाद की वास्तविक स्थिति
क्या बलात्कार की घटनाएँ बंद हो गईं? नहीं। տարբեր समाचारों एवं सरकारी रिकॉर्ड्स बताते हैं कि 2016, 2017, 2018 आदि वर्षों में भी नागालैंड में बलात्कार की घटनाएँ दर्ज हुईं. उदाहरण: कोहिमा में एक व्यक्ति को 2024 में एक नाबालिग लड़की के साथ यौन उत्पीड़न के लिए 20 साल की कठोर कारावास की सजा हुई. एक और मामला—2017 में, कोहिमा गाँव की 60 वर्षीय महिला के साथ दुष्कर्म का मामला दर्ज हुआ, अभियुक्त को 10 वर्ष की कठोर कारावास हुई. यह कहना कि 2015 की मॉब लिंचिंग के बाद से नागालैंड में किसी तरह का बलात्कार नहीं हुआ, गलत और भ्रामक है.
पारदर्शी तथ्य ये हैं:
2015 में दीमापुर की घटना एक अप्रिय एवं जघन्य उदाहरण था, जिसमें न्याय प्रक्रिया और फोरेंसिक जांच की भूमिका महत्वपूर्ण बनी. बाद के वर्षों में भी बलात्कार की घटनाएँ हुई और अभियुक्तों को न्यायालय ने सजाएँ दीं. सोशल मीडिया में फैलाया गया “नो रेप सince 2015” का दावा ठीक से आधारभूत आँकड़ों पर आधारित नहीं है.