
झारखंड के हजारीबाग जिले में स्थित एक प्राचीन श्मशान घाट दिवाली की रात एक अद्भुत और रहस्यमय दृश्य का साक्षी बनता है। जहां देशभर में लोग दीपों की रौशनी और मिठाइयों के साथ लक्ष्मी पूजन में व्यस्त होते हैं, वहीं इस श्मशान घाट पर जमा होते हैं तांत्रिक, सिद्ध, और साधक—अपने-अपने साधना और तंत्र की चरम सीमा को छूने के लिए। यह श्मशान घाट केवल अंतिम संस्कार का स्थल नहीं है, बल्कि तंत्र और साधना की गहराइयों में डूबे उन लोगों का केंद्र बन जाता है जो दिवाली की काली अमावस्या को साधना की सर्वोत्तम रात्रि मानते हैं। मान्यता है कि इस रात को की गई तांत्रिक साधनाएं शीघ्र फल देती हैं और विशेष शक्तियों की प्राप्ति संभव होती है।
तांत्रिकों का जमावड़ा
स्थानीय लोगों के अनुसार, हर साल दिवाली की रात यहां विभिन्न हिस्सों से तांत्रिकों का जमावड़ा लगता है। सिर पर राख, काले वस्त्र, त्रिपुंड लगाए और मंत्रोच्चार करते हुए ये साधक श्मशान को तपोभूमि में बदल देते हैं। कुछ खुले में अग्निकुंड रचते हैं तो कुछ गहन ध्यान में लीन रहते हैं। इन साधनाओं को आम जनता से दूर रखा जाता है और स्थानीय लोग भी इन गतिविधियों से सम्मानजनक दूरी बनाए रखते हैं।श्रद्धा और भय के इस मिश्रण ने इस स्थान को एक अलौकिक आभा दे दी है। कई स्थानीय कथाएं बताती हैं कि यहां साधना करने वाले साधकों को दिव्य अनुभव होते हैं—कभी अदृश्य शक्तियों की उपस्थिति, तो कभी भविष्यदर्शन की झलकें।
रात रहस्यों से घिरी
हालांकि, प्रशासन और पुलिस सतर्क रहते हैं ताकि किसी प्रकार की अवांछनीय गतिविधि न हो। फिर भी, यह रात रहस्यों से घिरी रहती है—जहां कुछ साधक शक्ति प्राप्ति की लालसा में रत होते हैं, तो कुछ आत्मज्ञान की खोज में। हजारीबाग का यह श्मशान घाट तंत्र की दुनिया का ऐसा द्वार है, जो केवल श्मशान की आग में तपकर ही खुलता है। दिवाली की रात यहां रोशनी नहीं, बल्कि अंधेरे में छुपी शक्ति की साधना होती है—एक ऐसी साधना, जो देखने वालों के रोंगटे खड़े कर देती है।