पिछले पांच वर्षों में भारत में कार्डियक मेडिकेशन यानी दिल से जुड़ी दवाओं की खपत में 50% तक का इजाफा हुआ है. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक यह कोई सामान्य हेल्थ ट्रेंड नहीं, बल्कि एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का संकेत है. दवाइयों की इस बेतहाशा मांग ने हेल्थ एक्सपर्ट्स और पॉलिसीमेकर्स को भी चिंता में डाल दिया है.
बदलती जीवनशैली, बढ़ता जोखिम
इस तेजी से बढ़ते ग्राफ के पीछे जीवनशैली में आए बड़े बदलाव हैं. भागदौड़ भरी दिनचर्या, नींद की कमी, जंक फूड का बढ़ता चलन और स्क्रीन टाइम का अत्यधिक उपयोग दिल को कमजोर बना रहा है. खासकर शहरी इलाकों में जहां युवाओं में भी हाई ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याएं आम होती जा रही हैं, वहां हृदय रोग अब केवल बुज़ुर्गों तक सीमित नहीं रहा.
तनाव और शारीरिक निष्क्रियता बड़ी वजहें
मानसिक तनाव और शारीरिक गतिविधियों की कमी ने हालात और भी खराब किए हैं. ऑफिस वर्क और डिजिटल जीवनशैली ने लोगों को कुर्सियों से चिपका दिया है, जिससे कार्डियोवस्कुलर हेल्थ बुरी तरह प्रभावित हो रही है. खास बात ये है कि अब 30 से 40 वर्ष की उम्र वाले भी हार्ट अटैक और स्ट्रोक जैसी स्थितियों से जूझ रहे हैं.
चेतावनी नहीं, चेतना बनाएं
विशेषज्ञों का मानना है कि अब सिर्फ चेतावनी जारी करने का समय नहीं है, बल्कि व्यापक जन-जागरूकता, नियमित स्वास्थ्य जांच और जीवनशैली में बदलाव लाने की जरूरत है. योग, संतुलित आहार, एक्सरसाइज और तनाव प्रबंधन जैसी साधारण आदतें भी दिल को लंबे समय तक स्वस्थ रख सकती हैं. वरना आने वाले सालों में यह "मौन महामारी" और भी गंभीर रूप ले सकती है.