इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अधिकतम सात साल तक की सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी और रिमांड की प्रक्रिया को लेकर पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को कड़ी चेतावनी दी है। एक नाबालिग आरोपी को बार-बार न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में गिरफ्तारी अपवाद होनी चाहिए, सामान्य नियम नहीं। पुलिस को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 35 और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पूरी तरह पालन करना होगा।
कानूनी शर्तों की जांच होनी चाहिए
न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत की पीठ ने कहा कि रिमांड देते समय मजिस्ट्रेट को न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करना जरूरी है। अधिकतम सात वर्ष की सजा वाले अपराध में हिरासत में भेजने से पहले गिरफ्तारी की वैधता और आवश्यक कानूनी शर्तों की जांच होनी चाहिए।
चार लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज
मामले में चार लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी। याचिकाकर्ता पर पहले बीएनएस की धारा 303(2) लगाई गई, जिसमें अधिकतम तीन वर्ष की सजा है। बाद में धारा 317(2) जोड़ी गई, जिसके तहत अधिकतम पांच वर्ष की सजा हो सकती है। गिरफ्तारी के बाद आरोपी को अलग-अलग मजिस्ट्रेटों के सामने पेश कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
उम्र की पुष्टि नहीं की
सुनवाई में सामने आया कि आरोपी नाबालिग था। उसके ट्रांसफर सर्टिफिकेट में जन्मतिथि 18 अप्रैल 2009 दर्ज थी, जबकि एफआईआर 27 अप्रैल 2026 को दर्ज हुई। इसके बावजूद पुलिस और रिमांड देने वाले मजिस्ट्रेट ने उसकी उम्र की पुष्टि नहीं की। हाईकोर्ट ने चार जून को उसकी हिरासत को प्रथमदृष्टया अवैध मानते हुए तत्काल रिहाई का आदेश दिया था।
जांच में सहयोग का अवसर
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के सतेंद्र कुमार अंतिल और अर्नेश कुमार मामलों में दिए निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि सात वर्ष तक की सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी से पहले निर्धारित कानूनी कसौटियां पूरी करना जरूरी है। पुलिस को आवश्यक होने पर नोटिस देकर आरोपी को जांच में सहयोग का अवसर देना चाहिए। हाईकोर्ट ने रिमांड आदेशों को प्रथमदृष्टया यांत्रिक माना। संबंधित न्यायिक अधिकारियों की माफी स्वीकार करते हुए उन्हें भविष्य में अधिक सतर्क रहने की चेतावनी दी गई। अदालत ने साफ किया कि कानून में तय सुरक्षा उपायों की अनदेखी और असंवेदनशीलता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
कोर्ट की अहम टिप्पणी
सात साल तक की सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी सामान्य प्रक्रिया नहीं हो सकती। रिमांड देने से पहले गिरफ्तारी की वैधता की जांच जरूरी है। नाबालिग होने का दावा सामने आने पर उसकी उम्र का सत्यापन अनिवार्य है। यदि हिरासत अवैध पाई जाती है तो जिम्मेदार अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जा सकता है। रिमांड आदेश में न्यायिक विवेक के इस्तेमाल के साथ उसके आधार भी स्पष्ट होने चाहिए।