Shravasti Encounter: उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती में पुलिस मुठभेड़ में घायल चोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने प्रथम दृष्टया पुलिस की एफआईआर में दर्ज घटनाक्रम और जांच की प्रक्रिया में कई विसंगतियां पाईं। इसके बाद मामले की निष्पक्ष और विस्तृत जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से कराने का आदेश दिया गया है। न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की अदालत ने CBI को तीन महीने के भीतर जांच रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर 2026 को होगी।
13 पुलिसकर्मी एक ही वाहन में कैसे पहुंचे?
मामला 9 मई 2025 को श्रावस्ती के इकौना थाना क्षेत्र में सात वर्षीय बच्ची को कथित तौर पर ई-रिक्शा से ले जाने से जुड़ा है। पुलिस ने बाद में चोटकऊ को मामले से जोड़ते हुए उसके खिलाफ अलग एफआईआर दर्ज की थी। पुलिस के मुताबिक, 12 मई को उसे नेपाल भागने से रोकने के लिए घेराबंदी की गई। पुलिस का दावा था कि चोटकऊ ने गोली चलाई और जवाबी कार्रवाई में SHO ने दो गोलियां चलाईं, जो उसके पैरों में लगीं। हालांकि, हाईकोर्ट ने पुलिस के इस घटनाक्रम पर सवाल उठाया। अदालत ने पूछा कि जब 13 पुलिसकर्मी एक ही सरकारी वाहन में थे, तो वे तीन अलग-अलग टीमों में बंटकर अलग-अलग रास्तों पर कैसे पहुंचे।
23 पुलिसकर्मियों की मौजूदगी पर भी सवाल
पुलिस के अनुसार, SWAT टीम के 10 जवानों समेत कुल 23 पुलिसकर्मी घेराबंदी में शामिल थे। कोर्ट ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि इतनी बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों की मौजूदगी के बावजूद आरोपी कथित तौर पर वहां से निकलने में कैसे सफल हुआ। पुलिस ने दावा किया था कि चोटकऊ की ओर से फायरिंग के बाद SHO ने आत्मरक्षा में गोली चलाई। अदालत ने रात के समय करीब 15 मीटर की दूरी से केवल हथियार लोड होने की आवाज के आधार पर निशाना साधने के दावे पर भी सवाल उठाए।
मेडिकल रिपोर्ट और गोली के निशान पर भी उठे सवाल
हाईकोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों को भी अपने आदेश में महत्वपूर्ण माना। अदालत ने गोली के आकार और शरीर पर मिले घावों को लेकर पुलिस के दावे पर स्पष्टीकरण मांगा। SHO की ओर से रात में चांदनी होने की बात कही गई, लेकिन अदालत ने उनके स्पष्टीकरण को प्रथम दृष्टया संतोषजनक नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों से पुलिस की बताई कहानी की सटीकता को लेकर गंभीर संदेह पैदा होता है। हालांकि, अदालत ने इस स्तर पर मामले में कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।
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पुलिसकर्मियों को मिला था पुरस्कार
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि कथित मुठभेड़ में शामिल 23 पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों को उनके काम के लिए पुरस्कृत किया गया था। अदालत ने इस तथ्य को भी अपने आदेश में दर्ज किया। साथ ही, चोटकऊ के पुराने मामले का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने बताया कि उसे पहले एक बच्ची से जुड़े मामले में दोषी ठहराया गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर 2022 को उसकी दोषसिद्धि और सजा रद्द कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले की जांच और साक्ष्यों के मूल्यांकन में गंभीर कमियां पाई थीं।
जांच प्रक्रिया पर भी हाईकोर्ट ने जताई आपत्ति
अदालत ने कहा कि मौजूदा मामले में जांच की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल हैं। शुरुआत में जांच SHO के अधीनस्थ पुलिस अधिकारी ने की थी और बाद में जांच स्थानांतरित की गई, लेकिन चार्जशीट उसी SHO की ओर से दाखिल की गई, जो मामले में शिकायतकर्ता भी था। हाईकोर्ट ने एनकाउंटर मामलों की जांच से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का भी उल्लेख किया और प्रथम दृष्टया माना कि उनका पालन नहीं हुआ। इसी वजह से अदालत ने स्वतंत्र जांच के लिए मामला CBI को सौंपने का फैसला किया है। CBI को SHO की कथित फायरिंग क्षमता समेत पूरे घटनाक्रम की जांच कर रिपोर्ट अदालत में पेश करनी होगी।