धार्मिक कथावाचक पं. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने हिंदू एकता, भक्ति और राष्ट्रवाद को लेकर उठ रहे सवालों पर खुलकर अपनी बात रखी है। छत्तीसगढ़ में प्रस्तावित हनुमंत कथा से पहले उन्होंने कहा कि हिंदू समाज को जोड़ना और आस्था का प्रचार करना किसी भी रूप में अंधविश्वास नहीं है। उनके इस बयान को राजनीतिक टिप्पणी के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है।
अंधविश्वास के आरोपों पर दो टूक जवाब
पं. धीरेंद्र शास्त्री ने कहा कि यदि हिंदू समाज को संगठित करना, भक्ति की भावना जगाना और राष्ट्र के प्रति चेतना पैदा करना अंधविश्वास कहलाता है, तो ऐसा सोचने वालों को आत्ममंथन करना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे कोई राजनीतिक नेता नहीं हैं, लेकिन जब आस्था और संस्कृति पर सवाल उठे, तो चुप रहना उचित नहीं।
भक्ति और राष्ट्रवाद को बताया सनातन परंपरा
शास्त्री ने हनुमान भक्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि यह केवल पूजा नहीं, बल्कि आत्मबल और अनुशासन का प्रतीक है। उनका कहना था कि सनातन परंपरा में भक्ति और राष्ट्रभाव हमेशा से समाज को जोड़ने का कार्य करते रहे हैं, न कि तोड़ने का।
बांग्लादेश के हालात का दिया उदाहरण
पड़ोसी देश के हालिया घटनाक्रम पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि वहां हिंदुओं पर अत्याचार की घटनाएं सामने आ रही हैं। शास्त्री ने चेताया कि अगर समय रहते समाज संगठित नहीं हुआ, तो ऐसी परिस्थितियों की आशंका कहीं भी पैदा हो सकती है।
जनसंख्या संतुलन और सामाजिक चेतावनी
उन्होंने दावा किया कि कुछ राज्यों में हिंदू आबादी अल्पसंख्यक स्थिति में पहुंच रही है। साथ ही लव जिहाद जैसे मुद्दों का जिक्र करते हुए कहा कि सामाजिक जागरूकता बेहद जरूरी है। उनके अनुसार, यही सही समय है जब सनातन एकता पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
हनुमंत कथा से पहले संदेश
भिलाई में होने वाली हनुमंत कथा से पहले शास्त्री ने आह्वान किया कि आस्था, संस्कृति और समाज की एकता को मजबूत करना हर सनातनी का दायित्व है।