रंगों का त्योहार होली इस साल 4 मार्च 2026 को मनाया जाएगा, जबकि होलिका दहन 2 मार्च को होगा। 3 मार्च को चंद्र ग्रहण होने के कारण इस बार दोनों के बीच दो दिन का अंतर है। जहां पूरा देश गुलाल और उत्साह में डूबा रहेगा, वहीं भारत के कुछ गांव ऐसे भी हैं जहां होली मनाना सख्त वर्जित है। इन जगहों से जुड़ी मान्यताएं और ‘श्राप’ की कहानियां आज भी लोगों को सिहरन दे देती हैं।
Rudraprayag: देवी के सम्मान में सन्नाटा
उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के कुरझां और क्विली गांवों में पिछले करीब 150 सालों से होली नहीं खेली गई। स्थानीय मान्यता के अनुसार यहां की आराध्य देवी त्रिपुर सुंदरी को शोर-शराबा और हुड़दंग पसंद नहीं है। ग्रामीण देवी के सम्मान में होली के दिन पूर्ण शांति बनाए रखते हैं। रुद्रप्रयाग वही पवित्र स्थान है जहां अलकनंदा और मंदाकिनी नदियों का संगम होता है और कोटेश्वर महादेव की प्राचीन गुफा स्थित है।
Bokaro के दुर्गापुर गांव की डरावनी कहानी
झारखंड के बोकारो जिले के कसमार ब्लॉक स्थित दुर्गापुर गांव में भी एक सदी से अधिक समय से होली नहीं मनाई जाती। गांव वालों के अनुसार करीब 100 साल पहले होली के दिन राजा के पुत्र की मृत्यु हो गई थी। कुछ समय बाद स्वयं राजा की भी होली के दिन ही मौत हो गई। मरने से पहले राजा ने आदेश दिया कि गांव में कभी होली न मनाई जाए। ग्रामीणों का विश्वास है कि इस परंपरा को तोड़ने पर अनहोनी हो सकती है।
Banaskantha का रामसन गांव: संतों के श्राप की मान्यता
गुजरात के बनासकांठा जिले के रामसन गांव (प्राचीन नाम रामेश्वर) में भी करीब 200 वर्षों से होली का रंग नहीं चढ़ा। लोककथाओं के अनुसार भगवान राम वनवास के दौरान यहां आए थे। कहा जाता है कि किसी अभिमानी राजा के अत्याचारों से दुखी संतों ने गांव को श्राप दे दिया था। तभी से यहां बड़े उत्सव, खासकर होली, सादगी और शांति के साथ बीतती है।
Tamil Nadu: परंपराओं की अलग राह
दक्षिण भारत के तमिलनाडु में होली उत्तर भारत की तरह धूमधाम से नहीं मनाई जाती। यहां जिस दिन उत्तर भारत में होली होती है, उसी समय ‘मासी मागम’ का पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन पूर्वजों की आत्माएं धरती पर आती हैं, इसलिए लोग पितरों के सम्मान में पूजा-अर्चना करते हैं। यही वजह है कि यहां रंगों की होली खेलने की परंपरा नहीं है।
इन गांवों की कहानियां यह बताती हैं कि भारत में परंपराएं और आस्थाएं कितनी विविध और गहरी हैं, जहां उत्सव से ज्यादा महत्व मान्यताओं को दिया जाता है।