करीब 100 दिनों की रुकावट के बाद दुनिया का सबसे अहम तेल मार्ग होर्मुज स्ट्रेट फिर से खुलने जा रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच हुए अंतरिम शांति समझौते के बाद तेल टैंकरों की आवाजाही बहाल होने की उम्मीद है। इससे फारस की खाड़ी में फंसा करोड़ों बैरल कच्चा तेल अब वैश्विक बाजारों तक पहुंच सकेगा।
6 करोड़ बैरल तेल बाजार में आएगा
रिपोर्ट्स के अनुसार लगभग 31 सुपरटैंकरों में करीब 6.2 करोड़ बैरल कच्चा तेल फंसा हुआ था। स्ट्रेट खुलते ही यह तेल अलग-अलग देशों की ओर रवाना होगा। इतनी बड़ी मात्रा में तेल की वापसी से बाजार में सप्लाई अचानक बढ़ सकती है, जिससे कीमतों पर दबाव देखने को मिल सकता है।
भारत के लिए बड़ी राहत
भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 से 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में तेल की कीमतें कम होना देश के लिए अच्छी खबर है। इससे आयात बिल घट सकता है, महंगाई पर नियंत्रण रखने में मदद मिलेगी और करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) का दबाव भी कम हो सकता है। ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से भी यह सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
कमी से ज्यादा सप्लाई की चिंता
कुछ सप्ताह पहले तक बाजार में तेल की कमी की आशंका थी, लेकिन अब तस्वीर बदल गई है। संघर्ष के दौरान एशियाई रिफाइनरियों ने वैकल्पिक स्रोतों से तेल खरीद लिया था। अब होर्मुज से बड़ी मात्रा में तेल आने पर जरूरत से ज्यादा सप्लाई की स्थिति बन सकती है। इससे तेल कंपनियों और रिफाइनरों की रणनीति पर असर पड़ सकता है।
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रिफाइनरियों के सामने नई चुनौती
कई एशियाई रिफाइनरियों के पास पहले से ही इस महीने और अगले महीने के लिए पर्याप्त तेल मौजूद है। ऐसे में अतिरिक्त खेप पहुंचने पर उन्हें तेल स्टोर करना पड़ सकता है या रिफाइनिंग क्षमता बढ़ानी पड़ सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार में अचानक आई अतिरिक्त सप्लाई कीमतों को और नीचे धकेल सकती है।
तेल बाजार का पूरा गणित बदला
संघर्ष के शुरुआती दिनों में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी थीं और सप्लाई संकट की आशंका जताई जा रही थी। लेकिन अब हालात उलट गए हैं। दुबई, मुरबान और ओमान जैसे मिडिल ईस्ट बेंचमार्क ग्रेड पर भी दबाव दिखने लगा है। कुछ डीजल और कच्चे तेल की खेप डिस्काउंट पर बिकने की खबरें सामने आई हैं।
अमेरिका-ईरान समझौते की अहम बातें
दोनों देशों के बीच हुए 14 बिंदुओं वाले समझौते में होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने, ईरान की कुछ जमी हुई संपत्तियां जारी करने, आर्थिक सहयोग बढ़ाने और परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत शुरू करने जैसे प्रावधान शामिल बताए गए हैं। हालांकि यह अभी अंतिम समझौता नहीं है और आगे 60 दिनों तक बातचीत जारी रहेगी।
आगे क्या होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समझौता सफल रहता है और तेल की सप्लाई सामान्य स्तर पर लौटती है तो कच्चे तेल की कीमतों में और नरमी आ सकती है। इसका फायदा भारत जैसे आयातक देशों को मिलेगा। हालांकि बाजार की नजर अब इस बात पर है कि आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान इस समझौते को कितना सफलतापूर्वक लागू कर पाते हैं।