भारत में हाइड्रोजन ट्रेन की शुरुआत के साथ लोगों के मन में कई सवाल उठ रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या चलती हुई ट्रेन अपने अंदर ही हाइड्रोजन ईंधन तैयार कर सकती है? और क्या इसमें रॉकेट जैसी तकनीक का इस्तेमाल होगा? इसका जवाब विज्ञान और मौजूदा तकनीक दोनों के आधार पर समझना जरूरी है।
आज की हाइड्रोजन ट्रेन कैसे चलती है?
फिलहाल दुनिया में चल रही हाइड्रोजन ट्रेनों में ईंधन चलते-चलते नहीं बनता। ट्रेन में पहले से भरे हाइड्रोजन टैंक लगे होते हैं। यह हाइड्रोजन फ्यूल सेल में हवा से मिलने वाली ऑक्सीजन के साथ रासायनिक प्रक्रिया से गुजरती है और बिजली बनाती है। यही बिजली मोटर को चलाती है। इस पूरी प्रक्रिया में धुआं नहीं निकलता, बल्कि सिर्फ पानी और थोड़ी गर्मी पैदा होती है।
रॉकेट वाली तकनीक क्यों नहीं अपनाई जाती?
रॉकेट में तरल हाइड्रोजन और तरल ऑक्सीजन को जलाकर बहुत अधिक ऊर्जा पैदा की जाती है। लेकिन यह तरीका ट्रेन के लिए सुरक्षित नहीं माना जाता। रॉकेट इंजन बेहद ज्यादा गर्मी पैदा करता है और उसमें इस्तेमाल होने वाले ईंधन को बहुत कम तापमान पर रखना पड़ता है। अगर ऐसी तकनीक ट्रेन में इस्तेमाल की जाए तो सुरक्षा का खतरा काफी बढ़ सकता है। यही वजह है कि ट्रेनों में फ्यूल सेल तकनीक को बेहतर और सुरक्षित विकल्प माना जाता है।
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क्या चलती ट्रेन खुद बना सकती है ईंधन?
सैद्धांतिक रूप से पानी से हाइड्रोजन बनाना संभव है, लेकिन इसके लिए बहुत ज्यादा बिजली चाहिए। अगर ट्रेन अपनी ही बिजली से हाइड्रोजन बनाने लगे तो ऊर्जा का बड़ा हिस्सा इसी प्रक्रिया में खर्च हो जाएगा। इससे ट्रेन की क्षमता, दूरी और दक्षता पर असर पड़ेगा। इसलिए मौजूदा तकनीक में चलती ट्रेन के अंदर ईंधन बनाना व्यावहारिक समाधान नहीं माना जाता।
भविष्य में क्या बदल सकता है?
वैज्ञानिक बेहतर फ्यूल सेल, हल्के हाइड्रोजन टैंक और ग्रीन हाइड्रोजन तकनीक पर लगातार काम कर रहे हैं। भविष्य में ऑन-बोर्ड हाइड्रोजन उत्पादन की तकनीक विकसित हो सकती है, लेकिन वह रॉकेट जैसी आग आधारित प्रणाली नहीं होगी। इसके बजाय सुरक्षित और नियंत्रित रासायनिक या इलेक्ट्रोकेमिकल प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाएगा।
अभी यही है सबसे सुरक्षित विकल्प
फिलहाल हाइड्रोजन ट्रेनें पहले से भरे ईंधन टैंकों और फ्यूल सेल तकनीक पर ही चलती हैं। यही तरीका सबसे सुरक्षित, भरोसेमंद और पर्यावरण के लिए बेहतर माना जा रहा है। आने वाले वर्षों में तकनीक जरूर और उन्नत होगी, लेकिन सुरक्षा और ऊर्जा दक्षता को सबसे अधिक प्राथमिकता दी जाएगी।