
ब्लैक मनी को व्हाइट करने के मामले में राजनीतिक पार्टियों पर कई आरोप लगते आए हैं। एक याचिका में ऐसा दावा भी किया गया है कि एक 'फर्जी' राजनीतिक दल 20 प्रतिशत कमीशन काटकर काले धन को सफेद में बदल रहा है। आइए जानते हैं कि ब्लैक मनी को व्हाइट करने का गणित क्या है। इसमें राजनीतिक दलों की क्या भूमिका हो रहती है:
मनी लॉन्ड्रिंग की क्या है प्रक्रिया
ब्लैक मनी अक्सर गैर-कानूनी या अनियमित गतिविधियों से मिलती है। ये रिश्वत, भ्रष्टाचार, या अपराध हो सकता है। काले धन को सफेद बनाने के लिए फर्जी कंपनियां तैयार की जाती है। ये असली व्यवसाय की आड़ में काम करती हैं। कालेधन को फर्जी कंपनियों में जमा किया जाता है। इसके बाद उसे विभिन्न माध्यमों से वैध व्यवसायों में निवेश किया जाता है। इस पैसे को दोबारा से विभिन्न तरीकों से निकाला जा सकता है। इसके चेक, बिल, या अन्य वित्तीय साधनों के माध्यम हो सकते हैं।
राजनीतिक दलों की क्या होती भूमिका
राजनीतिक दलों को चंदा और फंडिंग की जरूर होती है। कुछ मामलों में यह फंडिंग संदिग्ध स्रोतों से आती है। ये ब्लैक मनी का एक स्रोत हो सकती है। कुछ राजनीतिक दल फर्जी दानकर्ताओं के जरिए ब्लैक मनी को व्हाइट कर सकते हैं। इस तरह का याचिका में आरोप लगाया गया है। राजनीतिक दलों के पास नीतियों और कानूनों को प्रभावित करने की क्षमता होती है। इसका उपयोग वे अपने हितों की पूर्ति के लिए कर सकते हैं।
राजनीतिक पार्टियों को कुछ खास कर-छूट मिलती है
भारत में आयकर अधिनियम की धारा 13A के तहत राजनीतिक पार्टियों को कुछ खास कर-छूट मिलती है.अगर कोई पार्टी तय नियमों के तहत चंदा लेती है। उसका बही खाता सही है तो उसे टैक्स नहीं देना पड़ता है। यही कारण है कि पार्टियां कानूनी तरीके से भी बड़ी रकम को व्हाइट करने में सक्षम हैं। सबसे खास बात यह है कि राजनीतिक दलों को 20,000 रुपये से कम का चंदा लेने के लिए दानदाता के नाम को सामने रखने की जरूरत नहीं होती है।