अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए काम करने वाले एक प्रमुख संगठन 'वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी' (वीओपीएम) ने शुक्रवार को पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के खिलाफ जारी उत्पीड़न पर गंभीर चिंता जताई। संगठन ने 2026 की पहली छमाही के दौरान ईशनिंदा (ब्लासफेमी) के आरोपों, लक्षित हिंसा और कथित जबरन धर्म परिवर्तन के मामलों का हवाला दिया।
समाधान केवल सरकारी आश्वासनों से नहीं होगा
वीओपीएम ने कहा कि 'यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम' (यूएससीआईआरएफ) की ओर से दर्ज मामलों से यह साफ होता है कि भेदभावपूर्ण कानूनों, कमजोर जवाबदेही व्यवस्था और पर्याप्त सरकारी सुरक्षा की कमी का लोगों और उनके परिवारों पर कितना गहरा असर पड़ता है। संगठन का कहना है कि इन पीड़ितों की समस्याओं का समाधान केवल सरकारी आश्वासनों से नहीं होगा।
संगठन ने तीन नाबालिग लड़कियों के अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और शादी के मामलों का उल्लेख किया। वीओपीएम के अनुसार, ऐसे मामले सहमति, बच्चों की सुरक्षा और न्याय तक पहुंच को लेकर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
मारिया को एक 12 वर्षीय ईसाई लड़की बताया
रिपोर्ट के मुताबिक, एक अदालत ने मारिया की शादी को वैध माना। मारिया को एक 12 वर्षीय ईसाई लड़की बताया गया है, जबकि जिस व्यक्ति पर उसके अपहरण का आरोप था, उसकी उम्र 30 वर्ष बताई गई। वहीं, नेहा के परिवार का आरोप है कि एक व्यक्ति ने उसे सिलाई केंद्र से अगवा किया और जबरन धर्म परिवर्तन कराया। परिवार का यह भी कहना है कि पुलिस ने शुरू में कार्रवाई करने में देरी की।
सोनिया की उम्र 15 वर्ष बताई गई
इसी तरह सोनिया के परिवार ने भी अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन का आरोप लगाया। रिपोर्ट में कहा गया कि एक जन्म प्रमाण पत्र में सोनिया की उम्र 15 वर्ष बताई गई थी, लेकिन उसके कथित अपहरणकर्ताओं का दावा था कि उसकी उम्र 20 वर्ष है।
वीओपीएम ने कहा कि ऐसे मामलों की तुरंत और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, उम्र से जुड़े दस्तावेजों का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाना चाहिए और लड़कियों की बात बिना किसी दबाव के सुनी जानी चाहिए।
मरयम लाल के मामले का भी जिक्र किया
संगठन ने ईसाई नर्सों नविश अरूज और मरयम लाल के मामले का भी जिक्र किया। वीओपीएम के अनुसार, यह मामला दिखाता है कि किसी पर लगा आरोप अदालत के फैसले से पहले ही उसकी जिंदगी को किस तरह प्रभावित कर सकता है।