उत्तर प्रदेश के लखनऊ में आयोजित ‘आम महोत्सव 2025’ में हुस्नारा, अनारकली, मल्लिका जैसे आमों के खास नाम सुनकर जहाँ आम प्रेमी रुककर उसे निहार रहे हैं, वहीं इस पर छुपी दिलचस्प कहानियाँ भी लोगों को हैरान कर रही हैं. इन विचित्र और आकर्षक नामों में छुपा है हर किस्म का एक अनूठा इतिहास, जैसे हुस्नारा आम को मलिहाबाद के नवाबी दौर के एक नवाब ने अपनी बेटी हुस्नारा के नाम पर रखा, जबकि मल्लिका आम दरअसल नीलम और दशहरी का स्वादिष्ट संकरण है, जिसका नाम संस्कृत में 'चमेली' यानी 'जैस्मिन' से प्रेरित है. इस महोत्सव में सिर्फ स्वाद ही नहीं, बल्कि मान–सम्मान और इतिहास की खुशबू भी फैल रही है.
1,000 से अधिक किस्मों के आमों का प्रदर्शन
उत्तर प्रदेश के लखनऊ में आयोजित “आम महोत्सव 2025” में न केवल 1,000 से अधिक किस्मों के आमों का प्रदर्शन हो रहा है, बल्कि उनके अनोखे नाम—जैसे हुस्नारा, अनारकली, मल्लिका ने भी काफी चर्चा बटोर ली है. जानिए इन दुर्लभ और रोचक नामों के पीछे की दिलचस्प वैज्ञानिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कहानियां -
हुस्नारा – खूबसूरती का पर्याय
यह लाल-गुलाबी त्वचा और आकर्षक बनावट वाला आम मलिहाबाद की ख़ास किस्म है, जिसे दुनिया का सबसे खूबसूरत आम भी कहा जाता है. नाम 'हुस्नारा' उस अवधि की एक नवाब की बेटी “हुस्नारा” को सम्मानित करते हुए रखा गया और इस नाम ने इस किस्म को बाजार में विशेष स्थान दिलाया है.
मल्लिका – समृद्ध स्वाद
यह आम नीलम- दशहरी का संकरण है, जिसे डाक्टर रामनाथ सिंह ने विकसित किया. ‘मल्लिका’ संस्कृत शब्द ‘मल्लिका’ (चमेली) से लिया गया नाम है, जो इसके सुगंधित और मधुर स्वाद को दर्शाता है.
अनारकली – नाजुकपन का प्रतीक
‘अनारकली’ नाम इसकी नाजुक बनावट और दो परतों वाले स्वाद और छिलकों को इंगित करता है—यानि दो स्टाइलिश लेयर्स वाली सुंदर विशेषता. यह नाम आम के सौंदर्य और सुगमता को दर्शाता है, जैसा कि कथित रूप से जानी-पहचानी ऐतिहासिक व्यक्तियों से प्रेरित है.
इसके साथ रतौल, दशहरी, लंगड़ा, चौसा जैसे नाम उन इलाकों और राजाओं से जुड़े हैं,जहाँ से इनकी उत्पत्ति हुई. जैसे रतौल गाँव, चौसा (शेरशाह सूरी द्वारा नामित) इत्यादि.
ऐसे नामकरण के मायने
1. ब्रांडिंग स्ट्रेटेजी- अनोखे नाम आम को भीड़ में अलग पहचान देते हैं और बाजार मूल्य बढ़ाते हैं.
2. प्रसिद्धि का प्रभाव- नेताओं या ऐतिहासिक हस्तियों के नाम पर आम को समाजिक और बाज़ारिक मान्यता मिलती है.
3. स्वाद और बनावट की मिसाल- जैसे ‘अनारकली’ का नाजुकपन या ‘मल्लिका’ की खुशबू.
4. सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जुड़ाव- स्थानीय और ऐतिहासिक धरोहर से जुड़े नाम आमों को कहानी देते हैं.
दुर्लभ किस्मों की बढ़ रही मांग
मलिहाबाद जैसे क्षेत्रों में हुस्नारा, रतौल और टूचुमी जैसी दुर्लभ किस्मों को दोबारा से विकसित किया जा रहा है. क्योंकि उपभोक्ता अब सिर्फ दशहरी नहीं, बल्कि कई तरह के स्वादों को तवज्जो दे रहे हैं. ऐसी कृषि न केवल जैविक संरक्षण को बढ़ावा देता है, बल्कि किसानों को भी ₹80–120/किलो की बढ़ी हुई कीमत सुनिश्चित करता है, जबकि पारंपरिक दशहरी की कीमत ₹40–60/किलो रहती है.
‘हुस्नारा’, ‘अनारकली’, ‘मल्लिका’ जैसे नाम सिर्फ ब्रांड नहीं ये हैं विज्ञान, इतिहास और सांस्कृतिक पहचान का संगम. लखनऊ का आम महोत्सव न सिर्फ स्वादों की विविधता का जश्न है, बल्कि यह एक मान्यता और मार्मिकता भरा अनुभव भी प्रदान करता है. ऐसे नाम किसानों, संगठनों और उपभोक्ताओं को एक साझा कहानी से जोड़ते हैं, जहाँ हर आम एक पहचान, स्वाद और इतिहास के साथ आता है.