Viral News : हाल ही में एक सत्संग कार्यक्रम के दौरान एक छात्र ने आध्यात्मिक गुरु प्रेमानंद महाराज के सामने अपनी ऐसी आदत का जिक्र किया, जिसने वहां मौजूद लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया। छात्र ने बताया कि वह 9वीं कक्षा में पढ़ता है और कम उम्र में ही शराब पीने की आदत का शिकार हो चुका है। छात्र की बात सुनने के बाद प्रेमानंद महाराज ने उसे डांटने या अपमानित करने के बजाय बेहद शांत और सकारात्मक तरीके से समझाने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि आज के समय में कई बच्चे गलत संगति, सोशल मीडिया के प्रभाव और परिवार से पर्याप्त संवाद न होने के कारण भटक जाते हैं.
बच्चों को डांटने से नहीं, समझाने से होगा सुधार
प्रेमानंद महाराज ने कहा कि किसी भी बच्चे को सुधारने का सबसे अच्छा तरीका प्रेम और संवाद है। यदि माता-पिता या शिक्षक केवल डांट-फटकार का सहारा लेते हैं, तो बच्चे और अधिक जिद्दी हो सकते हैं। उन्होंने बताया कि बच्चों के मन को समझना जरूरी है। जब परिवार बच्चे के साथ समय बिताता है, उसकी समस्याएं सुनता है और उसे सही-गलत का अंतर समझाता है, तब उसके भीतर सकारात्मक बदलाव आने की संभावना बढ़ जाती है.
संगति का बच्चों के जीवन पर गहरा प्रभाव
महाराज ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि अच्छी और बुरी संगति व्यक्ति के जीवन की दिशा तय करती है। किशोरावस्था में बच्चे सबसे अधिक अपने दोस्तों और आसपास के माहौल से प्रभावित होते हैं। यदि वे गलत आदतों वाले लोगों के संपर्क में आते हैं, तो नशा, अनुशासनहीनता और अन्य बुरी आदतों की ओर आकर्षित हो सकते हैं। इसलिए माता-पिता को बच्चों के मित्रों और उनकी दिनचर्या पर ध्यान देना चाहिए.
आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा की जरूरत
उन्होंने कहा कि बच्चों को केवल स्कूल की शिक्षा देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें नैतिक मूल्यों, संस्कारों और आत्मअनुशासन की शिक्षा भी मिलनी चाहिए। जब बच्चे जीवन के उद्देश्य, अच्छे व्यवहार और जिम्मेदारियों को समझते हैं, तो वे गलत रास्तों से दूर रहने का प्रयास करते हैं। आध्यात्मिक गतिविधियां और सकारात्मक वातावरण भी उनके व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण
प्रेमानंद महाराज ने अंत में कहा कि बच्चों के सुधार की शुरुआत घर से होती है। यदि परिवार प्रेम, विश्वास और अच्छे संस्कारों का वातावरण बनाए रखे, तो बच्चे बड़ी से बड़ी बुरी आदत छोड़ सकते हैं। उन्होंने अभिभावकों से आग्रह किया कि वे बच्चों के साथ मित्रवत व्यवहार करें, ताकि वे अपनी समस्याएं खुलकर साझा कर सकें। उनका मानना है कि स्नेह, मार्गदर्शन और सही संगति ही बच्चों को बेहतर भविष्य की ओर ले जाने का सबसे प्रभावी तरीका है.