IDBI Bank Strike: अगर आपका खाता IDBI बैंक में है और आप 2 या 3 नवंबर को बैंक से जुड़ा कोई जरूरी काम कराने की तैयारी कर रहे हैं, तो आपको थोड़ी सावधानी बरतने की जरूरत है। दरअसल, बैंक के 10 हजार से ज्यादा कर्मचारी इन दोनों दिनों में भूख हड़ताल करने जा रहे हैं। कर्मचारी बैंक के प्रस्तावित निजीकरण का विरोध कर रहे हैं। ऐसे में बैंक की सेवाओं पर असर पड़ने की आशंका है।
निजीकरण के फैसले से नाराज हैं कर्मचारी
'यूनाइटेड फोरम ऑफ IDBI ऑफिसर्स एंड एम्प्लॉइज' का कहना है कि IDBI बैंक ने बीते कुछ वर्षों में अपनी आर्थिक स्थिति में काफी सुधार किया है। एक समय बैंक को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा था, लेकिन सरकार की ओर से मिले सार्वजनिक निवेश और कर्मचारियों की मेहनत के दम पर बैंक ने वापसी की। संगठन के मुताबिक, पिछले तीन साल से बैंक लगातार अच्छा मुनाफा कमा रहा है। ऐसे में इसे निजी हाथों में सौंपने का फैसला सही नहीं है।
कर्मचारी केंद्र सरकार के उस प्रस्ताव का भी विरोध कर रहे हैं, जिसके तहत बैंक की बड़ी हिस्सेदारी कनाडा की कंपनी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स की सहायक इकाई को बेची जानी है। 14 अक्टूबर 2026 को कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स (CCEA) ने इस सौदे को मंजूरी दी थी। प्रस्ताव के मुताबिक, सरकार अपनी 30।48 फीसदी और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) अपनी 30।24 फीसदी हिस्सेदारी बेचेगा। इस तरह कुल 60।72 फीसदी हिस्सेदारी विदेशी निवेशक को देने की योजना है।
यूनियन को क्यों सता रही है चिंता?
ऑल इंडिया बैंक एम्प्लॉइज एसोसिएशन (AIBEA) और यूनाइटेड फोरम का मानना है कि यह मामला केवल बैंक के निजीकरण तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक, इससे देश के एक पुराने और बड़े बैंक का नियंत्रण विदेशी कंपनी के पास चला जाएगा। यूनियन ने इसे बैंक का 'फॉरेनाइजेशन' बताया है। कर्मचारी संगठनों का सवाल है कि जब सरकार आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा देने की बात करती है, तो देश के इतने अहम बैंक की जिम्मेदारी विदेशी निवेशक को देने की जरूरत क्यों पड़ रही है? उनका कहना है कि IDBI बैंक में आम लोगों की करीब 3।5 लाख करोड़ रुपये की जमा राशि है। ऐसे में इतनी बड़ी रकम और बैंक के कामकाज पर किसी विदेशी निजी कंपनी का नियंत्रण होने से कई तरह की चिंताएं पैदा हो सकती हैं।
यूनियन को आशंका है कि मालिकाना हक बदलने के बाद बैंक की प्राथमिकताएं भी बदल सकती हैं। अभी तक बैंक की भूमिका आम लोगों को बैंकिंग सुविधाएं देने और देश के आर्थिक विकास में योगदान करने की रही है। लेकिन निजी कंपनी के नियंत्रण में आने पर मुनाफा कमाना सबसे बड़ी प्राथमिकता बन सकता है। कर्मचारियों का यह भी कहना है कि भविष्य में अगर विदेशी कंपनी किसी आर्थिक संकट में फंसती है या उसके प्रबंधन से जुड़ी कोई समस्या आती है, तो इसका असर भारतीय जमाकर्ताओं के हितों पर पड़ सकता है।
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सरकार ने सौदे को बताया फायदेमंद
दूसरी ओर, सरकार का तर्क है कि हिस्सेदारी की बिक्री के बाद भी IDBI बैंक भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नियमों और निगरानी के दायरे में रहेगा। सरकार के मुताबिक, इस सौदे में बैंक के शेयरों की कीमत का पूरा ध्यान रखा गया है और बिक्री बाजार में तय मूल्य से बेहतर दर पर की जा रही है। सरकार की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, दो स्वतंत्र एजेंसियों ने बैंक के एक शेयर का मूल्य 75।99 रुपये आंका था। वहीं, फेयरफैक्स ने प्रति शेयर 81 रुपये की पेशकश की है। इस तरह प्रस्तावित कीमत मूल्यांकन से 5.01 रुपये अधिक है।
सरकार का यह भी कहना है कि हिस्सेदारी बेचने के बाद भी उसके पास बैंक के 15 फीसदी और LIC के पास 19 फीसदी शेयर बने रहेंगे। यानी दोनों की कुल 34 फीसदी हिस्सेदारी बैंक में बरकरार रहेगी। सरकार का दावा है कि इससे बैंक की आगे की प्रगति में सार्वजनिक क्षेत्र की भागीदारी बनी रहेगी।