Azlur Rehman Attacks Asim Munir: पाकिस्तान में सेना की राजनीतिक भूमिका को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (फजल) यानी जेयूआई-एफ के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि यदि सेना राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाना चाहती है तो उसे वर्दी छोड़कर राजनीतिक दल बनाना चाहिए और चुनावी मैदान में उतरना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार बनाना या गिराना सेना का नहीं, बल्कि जनता के जनादेश का विषय है। उनके इस बयान के बाद पाकिस्तान की राजनीति में सेना के बढ़ते प्रभाव को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।
सेना की राजनीतिक भूमिका पर उठाए सवाल
एक सार्वजनिक सभा को संबोधित करते हुए मौलाना फजलुर रहमान ने कहा कि सेना का दायित्व देश की सीमाओं और सुरक्षा की रक्षा करना है, न कि राजनीतिक फैसलों में हस्तक्षेप करना। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में यह तय करने का अधिकार केवल जनता को है कि सत्ता किसके हाथ में होगी। रहमान ने कहा कि यदि कोई सैन्य अधिकारी राजनीतिक भूमिका निभाना चाहता है तो उसे संवैधानिक प्रक्रिया अपनानी चाहिए और आम नागरिक की तरह चुनाव लड़ना चाहिए।
मिलिशिया बनाने के प्रस्ताव का किया विरोध
फजलुर रहमान ने आतंकवाद से निपटने के नाम पर आम नागरिकों को हथियार देने या स्थानीय मिलिशिया बनाने के विचार का भी विरोध किया। उन्होंने कहा कि हथियार आम लोगों के हाथों में पहुंचने से भविष्य में हिंसा, आपसी दुश्मनी और कानून-व्यवस्था की समस्याएं बढ़ सकती हैं। उनके अनुसार, सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना राज्य और उसकी संस्थाओं की जिम्मेदारी है, इसे नागरिकों पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
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बलूचिस्तान और पश्तून इलाकों के हालात पर चिंता
अपने संबोधन में जेयूआई-एफ प्रमुख ने बलूचिस्तान और पश्तून बहुल क्षेत्रों की स्थिति को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि इन इलाकों में सरकार का प्रभाव कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है और लोगों में असुरक्षा का माहौल है। उनके अनुसार, हाल के दिनों में बड़ी संख्या में लोगों की मौत की खबरें सामने आई हैं, जबकि आम नागरिक, बच्चे और मजदूर भी भय के माहौल में जीवन बिताने को मजबूर हैं। उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों में शांति और कानून व्यवस्था बहाल करने के लिए प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है।
बयान के बाद तेज हुई राजनीतिक बहस
मौलाना फजलुर रहमान का यह बयान ऐसे समय आया है, जब सेना प्रमुख असीम मुनीर की भूमिका को लेकर पाकिस्तान में पहले से ही चर्चा चल रही है। हाल ही में उन्हें जनसंख्या से जुड़े एक सरकारी उच्चस्तरीय समिति में शामिल किए जाने के बाद विपक्षी दलों और राजनीतिक विश्लेषकों ने सेना की बढ़ती प्रशासनिक भागीदारी पर सवाल उठाए हैं। माना जा रहा है कि रहमान के ताजा बयान से पाकिस्तान में सेना और राजनीति के संबंधों पर चल रही बहस आने वाले दिनों में और अधिक तेज हो सकती है।