अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने अपनी नई रिपोर्ट में साफ किया है कि भारत अब 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था वित्त वर्ष 2029 में बनेगा. यानी लक्ष्य को हासिल करने में पहले के अनुमान से पूरा एक साल अधिक लग सकता है. यह देरी इसलिए हो रही है क्योंकि जीडीपी ग्रोथ अनुमान अपेक्षा से कमजोर दिखे हैं और रुपये की गिरावट तेज रही है. IMF के मुताबिक वित्त वर्ष 2028 में भारत का GDP करीब 4.96 ट्रिलियन डॉलर ही पहुंच पाएगा, जबकि पहले इसका अनुमान 5.15 ट्रिलियन डॉलर था. यह नए अनुमान पुराने प्रोजेक्शन से काफी नीचे हैं.
क्यों कम किया गया GDP का अनुमान?
IMF ने अपने अनुमान में कटौती का सबसे बड़ा कारण रुपये की गिरती हुई वैल्यू को बताया है. पहले जहां वित्त वर्ष 2025 के लिए विनिमय दर 82.5 रुपये प्रति डॉलर मानी गई थी, अब उसे बढ़ाकर 84.6 रुपये कर दिया गया है. आगे वित्त वर्ष 2026 और 2027 में यह दर क्रमश: 87 और 87.7 रुपये प्रति डॉलर तक जाने का अनुमान है. हाल ही में रुपया 89.49 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर तक गिर चुका है. इसका सीधा असर डॉलर बेस्ड GDP पर पड़ा है. IMF ने भारत की करेंसी व्यवस्था को भी 'स्टेबल' से 'क्रॉल-लाइक' श्रेणी में रखा है, जिससे संकेत मिलता है कि रुपये में उतार-चढ़ाव अब ज्यादा दिख रहा है.
ये भी पढ़ें : Udupi पहुंचे प्रधानमंत्री Modi, श्री कृष्ण मठ में की पूजा, गीता के संदेश और राम मंदिर आंदोलन की याद दिलाई
ग्रोथ रेट में भी दिखी सुस्ती
रुपये की कमजोरी और बदलती आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए IMF ने नॉमिनल GDP ग्रोथ के अनुमान भी नीचे कर दिए हैं. अब वित्त वर्ष 2026 में 8.5% ग्रोथ की उम्मीद है, जबकि पहले यही अनुमान 11% था. डॉलर के हिसाब से देखें तो ग्रोथ और कमजोर दिखाई दे रही है—वित्त वर्ष 2026 में 5.5% और वित्त वर्ष 2027 में केवल 9.2% ग्रोथ की भविष्यवाणी की गई है. इसका मतलब यह है कि रुपये की गिरावट देश की आर्थिक गति को डॉलर के संदर्भ में धीमा दिखा रही है. हालांकि IMF ने साफ कहा है कि इन झटकों के बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है.
IMF को अब भी भारत के भविष्य पर भरोसा
IMF का मानना है कि मजबूत घरेलू मांग, बढ़ता इंफ्रास्ट्रक्चर और लगातार चल रहे सुधार भारत को आगे भी मजबूती देते रहेंगे. अगर भारत अपने बड़े व्यापार समझौतों को पूरा कर लेता है और सुधार की रफ्तार बनाए रखता है, तो आने वाले वर्षों में आर्थिक प्रदर्शन और बेहतर हो सकता है. कुछ भारतीय विशेषज्ञों ने IMF के अनुमानों को थोड़ा ज्यादा सतर्क और रूढ़िवादी करार दिया है. कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि भारतीय निर्यात पर अमेरिकी टैरिफ के अनुमान या रुपये के लंबे समय तक कमजोर रहने की भविष्यवाणी इतनी सटीक नहीं हो सकती. कुल मिलाकर IMF ने समयसीमा जरूर बढ़ाई है, लेकिन भारत की आर्थिक क्षमता और भविष्य पर उसका भरोसा बरकरार है.