अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने तेल की बढ़ती कीमतों को लेकर सरकारों को सख्त संदेश दिया है। IMF का कहना है कि पेट्रोल और डीजल की महंगाई का असर सीधे जनता तक पहुंचने देना चाहिए। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि सरकारें सब्सिडी या कीमतों पर कैप लगाकर लोगों को इस दर्द से बचाने की कोशिश न करें, क्योंकि इससे समस्या और बढ़ सकती है।
सब्सिडी से बढ़ेगा संकट
IMF के मुताबिक अगर सरकारें कीमतों को कृत्रिम रूप से कम रखेंगी तो लोग ईंधन की खपत कम नहीं करेंगे। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग बनी रहेगी और कीमतें ऊंची रहेंगी। नतीजा यह होगा कि सरकारों पर सब्सिडी का बोझ बढ़ता जाएगा और एक ऐसा चक्र बन जाएगा, जिससे निकलना मुश्किल हो जाएगा।
मंदी का भी खतरा बढ़ा
रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि अगर कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी की ओर बढ़ सकती है। ईरान और पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव ने पहले ही बाजार को अस्थिर कर दिया है और इसका असर दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं पर दिखने लगा है।
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भारत की रणनीति अलग
भारत ने इस स्थिति में संतुलन बनाने की कोशिश की है। सरकार ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों को स्थिर रखने के लिए एक्साइज ड्यूटी में कटौती की और सार्वजनिक तेल कंपनियों के जरिए कुछ बोझ खुद उठाया। इससे आम जनता पर तुरंत असर नहीं पड़ा, लेकिन लंबे समय में यह नीति चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
एलपीजी पर मिला-जुला असर
एलपीजी के मामले में सरकार का रुख थोड़ा अलग रहा है। घरेलू सिलेंडर की कीमतों में मामूली बढ़ोतरी की गई है, जबकि कमर्शियल सिलेंडर की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार के अनुसार बढ़ाई गई हैं। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, इसलिए वैश्विक कीमतों का असर यहां भी साफ दिखता है।
आगे का रास्ता चुनौतीपूर्ण
IMF की सलाह के बाद अब सरकारों के सामने बड़ा सवाल यह है कि वे जनता को राहत दें या आर्थिक संतुलन बनाए रखें। भारत जैसे देश के लिए यह फैसला और भी कठिन है, जहां महंगाई का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ता है। आने वाले समय में यही संतुलन सबसे बड़ी परीक्षा साबित होगा।