1 जनवरी 2026 से भारत BRICS की अध्यक्षता संभालने जा रहा है और यह समय वैश्विक राजनीति के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। अमेरिका की नीतियों ने अनजाने में भारत, चीन और रूस को और करीब ला दिया है, जिससे BRICS की भूमिका पहले से ज्यादा मजबूत हो गई है। अमेरिका की चिंता इस बात से भी समझी जा सकती है कि डोनाल्ड ट्रंप ने BRICS देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ की धमकी तक दी थी। इस बीच BRICS देश कृषि, खाद्य सुरक्षा और वैश्विक दक्षिण के हितों को रणनीतिक प्राथमिकता बना रहे हैं, जिससे पश्चिमी दबदबे को सीधी चुनौती मिल रही है।
तेल और सोने में BRICS की ताकत
BRICS देशों की असली ताकत संसाधनों में छिपी है। विश्व ऊर्जा आंकड़ों के मुताबिक 2024 में BRICS देशों ने दुनिया के करीब 42 प्रतिशत कच्चे तेल का उत्पादन किया। इतना ही नहीं, विश्व स्वर्ण परिषद के अनुसार BRICS देशों के पास दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत सोने का भंडार है। चीन और रूस अकेले ही केंद्रीय बैंकों के वैश्विक स्वर्ण भंडार का बड़ा हिस्सा रखते हैं। अगर घरेलू भंडार जोड़ा जाए तो भारत की स्थिति और भी मजबूत हो जाती है, जिससे BRICS की सौदेबाजी शक्ति कई गुना बढ़ जाती है।
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GDP और रुपये में कारोबार
आर्थिक मोर्चे पर भी BRICS तेजी से आगे बढ़ रहा है। विश्व बैंक के अनुसार 2024 में BRICS देशों का वैश्विक GDP में लगभग 29 प्रतिशत योगदान रहा। इसी कड़ी में भारत ने डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देते हुए BRICS देशों के साथ 100 प्रतिशत व्यापार रुपये में करने की अनुमति दी है। RBI ने बैंकों को वोस्त्रो खाते खोलने की छूट दी, जिससे सदस्य देश सीधे रुपये में लेनदेन कर सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे वैश्विक बाजार में डॉलर की पकड़ कमजोर हो सकती है।
डॉलर से अलग भुगतान और रूस तेल
BRICS देश डॉलर से अलग वैकल्पिक भुगतान प्रणाली बनाने की दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं। इसे BRICS की सबसे अहम रणनीतिक प्राथमिकता माना जा रहा है। इसी बीच भारत और रूस के बीच कच्चे तेल का व्यापार मजबूत बना हुआ है। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद भारत रोजाना करीब 10 लाख बैरल रूसी तेल आयात कर रहा है। रिलायंस जैसी बड़ी कंपनियों ने भी रियायती रूसी तेल की खरीद शुरू कर दी है। साफ है कि 2026 में BRICS के उभार से अमेरिकी वर्चस्व को बड़ी चुनौती मिलने वाली है।