मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति को लेकर नई चुनौती सामने आई है। अमेरिका ने भारत को रूस से कच्चा तेल खरीदने के लिए सीमित समय की छूट दी है। इस फैसले के तहत भारतीय कंपनियां समुद्र में फंसे रूसी तेल के कार्गो को खरीद सकेंगी। हालांकि यह अनुमति केवल लगभग तीस दिनों के लिए दी गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला वैश्विक बाजार में तेल की सप्लाई को बनाए रखने के लिए लिया गया है, ताकि अचानक ऊर्जा संकट की स्थिति न बने।
छूट के बावजूद महंगा पड़ रहा रूसी तेल
रिपोर्ट के अनुसार इस बार रूस से मिलने वाला तेल पहले की तुलना में अधिक कीमत पर खरीदा जा रहा है। बताया जा रहा है कि रूसी यूराल तेल को ब्रेंट क्रूड की तुलना में लगभग चार से पांच डॉलर प्रति बैरल ज्यादा कीमत पर बेचा जा रहा है। इससे पहले फरवरी में भारत को इसी तेल पर करीब तेरह डॉलर प्रति बैरल तक की छूट मिल रही थी। ऐसे में अब भारतीय रिफाइनरियों के लिए तेल खरीदना महंगा पड़ सकता है।
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भारतीय रिफाइनरियां कर रही बड़ी खरीदारी
मिडिल ईस्ट में आपूर्ति को लेकर बढ़ती अनिश्चितता के कारण भारत की कई सरकारी रिफाइनरियां रूस से तुरंत डिलीवरी के लिए कच्चा तेल खरीद रही हैं। इनमें इंडियन ऑयल कॉर्प, भारत पेट्रोलियम कॉर्प, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्प और मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड जैसी कंपनियां शामिल हैं। जानकारी के मुताबिक भारतीय कंपनियां अब तक लगभग दो करोड़ बैरल रूसी तेल खरीद चुकी हैं और आगे भी आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए बातचीत जारी है।
भारत के पास सीमित तेल भंडार
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है और देश के पास लगभग पच्चीस दिनों की मांग के बराबर कच्चे तेल का भंडार मौजूद है। भारत के कुल तेल आयात का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आता है और उसका काफी भाग होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। ऐसे में अगर क्षेत्र में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है तो भारत को ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों दोनों को लेकर अतिरिक्त दबाव का सामना करना पड़ सकता है।