भारत तेजी से बढ़ते ई-वेस्ट को अब बोझ नहीं, संसाधन के तौर पर देख रहा है। स्मार्टफोन, ई-स्कूटर बैटरियों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से निकलने वाले कचरे से लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे क्रिटिकल मिनरल्स निकाले जा रहे हैं। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल देश में करीब 1.5 मिलियन टन ई-वेस्ट पैदा हुआ। विशेषज्ञ मानते हैं कि असली संख्या इससे भी ज्यादा हो सकती है। बढ़ती मांग और घरेलू खनन में देरी को देखते हुए ‘अर्बन माइनिंग’ को समाधान के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है।
कैसे निकलता है ‘व्हाइट गोल्ड’?
हरियाणा स्थित प्लांट्स में पुरानी बैटरियों को पहले क्रश कर ‘ब्लैक मास’ बनाया जाता है। फिर केमिकल प्रोसेसिंग, फिल्टरिंग और इवैपोरेशन के बाद लिथियम का महीन सफेद पाउडर तैयार होता है, जिसे उद्योग जगत ‘व्हाइट गोल्ड’ कहता है। इंडस्ट्री अनुमान के अनुसार, ई-वेस्ट से मिनरल रिकवरी का बाजार सालाना 6 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। हालांकि यह पूरी घरेलू मांग नहीं पूरी कर पाएगा, लेकिन आयात पर निर्भरता कम करने में मददगार होगा।
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नीतिगत समर्थन और EPR नियम
NITI Aayog ने चेताया है कि संगठित रीसाइक्लिंग अभी लक्ष्य से पीछे है। इसी कमी को दूर करने के लिए सरकार ने 170 मिलियन डॉलर का कार्यक्रम शुरू किया, जो एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (EPR) नियमों पर आधारित है। इसके तहत कंपनियों को ई-वेस्ट इकट्ठा कर पंजीकृत रीसाइक्लर्स को देना अनिवार्य है। उद्योग के अनुसार अब करीब 60 प्रतिशत ई-वेस्ट औपचारिक क्षेत्र में आ रहा है, हालांकि कुछ रिपोर्टें बताती हैं कि 80 प्रतिशत से अधिक कचरा अब भी अनौपचारिक क्षेत्र में प्रोसेस होता है।
चुनौतियां और आगे की राह
भारत लिथियम, कोबाल्ट और निकल के लिए लगभग 100 प्रतिशत आयात पर निर्भर है। चीन और यूरोपीय संघ ने उन्नत रिकवरी तकनीकों में भारी निवेश किया है, जबकि भारत की औपचारिक क्षमता अभी सीमित है। अनौपचारिक रीसाइक्लिंग में खुले में जलाना और एसिड प्रोसेस जैसे खतरनाक तरीके अपनाए जाते हैं, जिससे पर्यावरण और स्वास्थ्य जोखिम बढ़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अनौपचारिक क्षेत्र को ट्रेसेबल सप्लाई चेन में जोड़ा जाए, तो कीमती मिनरल्स का नुकसान कम किया जा सकता है और भारत ई-वेस्ट से सचमुच ‘सोना’ निकाल सकता है।