India Economy Global Risks : भारत की अर्थव्यवस्था लगातार बढ़ रही है और दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह मजबूत कर रही है। लेकिन इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रधान सचिव डॉ. पी.के. मिश्रा ने देश को आने वाली चुनौतियों को लेकर सतर्क रहने की सलाह दी है। मुंबई में आयोजित एसबीआई बैंकिंग और इकोनॉमिक्स कॉन्क्लेव में उन्होंने कहा कि भारत ने कोरोना महामारी से लेकर पश्चिम एशिया के तनाव जैसे कई मुश्किल दौर सफलतापूर्वक पार किए हैं, लेकिन आगे भी कई खतरे सामने खड़े हैं।
दुनिया में बदल रहे हालात चिंता की वजह
डॉ. मिश्रा ने कहा कि दुनिया तेजी से बदल रही है। कई देशों के बीच पुराने सहयोग कमजोर पड़ रहे हैं और नए तनाव पैदा हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि अब व्यापार और सामान की सप्लाई को भी दबाव बनाने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसे हालात में किसी भी देश के लिए आर्थिक योजनाएं बनाना पहले की तुलना में ज्यादा मुश्किल हो गया है। उनका कहना था कि भारत को सिर्फ अनुकूल माहौल के भरोसे नहीं बैठना चाहिए।
व्यापार और निवेश पर भी नजर रखने की जरूरत
प्रधान सचिव ने कहा कि दुनिया में व्यापार से जुड़ी नई बाधाएं बढ़ रही हैं। कई देश आयात-निर्यात पर नए नियम और शुल्क लगा रहे हैं। इसका असर भारतीय कंपनियों और निर्यात पर पड़ सकता है। इसके अलावा विदेशी निवेश का प्रवाह भी पहले की तरह स्थिर नहीं रहा। कभी निवेश तेजी से आता है तो कभी अचानक कम हो जाता है। ऐसी स्थिति में अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।
एआई भी बन सकता है नई चुनौती
डॉ. मिश्रा ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में एआई का असर रोजगार, उद्योग और कारोबार के कई क्षेत्रों पर पड़ सकता है। अभी यह पूरी तरह साफ नहीं है कि इसका प्रभाव कितना बड़ा होगा, लेकिन भारत को पहले से तैयारी करनी होगी ताकि बदलती तकनीक के साथ कदम मिलाया जा सके।
बैंकों को भी दी खास सलाह
उन्होंने बैंकिंग क्षेत्र को भी सावधान रहने को कहा। उनका कहना था कि बैंकों को बिना पूरी जांच के बड़े पैमाने पर कर्ज नहीं बांटना चाहिए। अतीत में गलत कर्ज वितरण की वजह से बैंकों पर भारी बोझ बढ़ा था और उसे संभालने में वर्षों लग गए थे। इसलिए मौजूदा अच्छे हालात देखकर भविष्य के जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
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भारत के लिए क्या है आगे का रास्ता?
डॉ. मिश्रा ने कहा कि भारत को सिर्फ उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। देश को नई तकनीक, नए विचार और नए उत्पाद तैयार करने पर भी जोर देना होगा। उन्होंने कहा कि "मेक इन इंडिया" के साथ-साथ "डिजाइन इन इंडिया" और "इनोवेट इन इंडिया" को भी आगे बढ़ाना जरूरी है। उनका मानना है कि मजबूत उद्योग, बेहतर बुनियादी ढांचा, नई तकनीक और समझदारी से लिया गया वित्तीय फैसला ही भारत को आने वाले वैश्विक जोखिमों से सुरक्षित रख सकता है।