दुनिया के किसी भी हिस्से में युद्ध, तनाव या आर्थिक प्रतिबंधों का सबसे बड़ा असर अगर किसी उभरती अर्थव्यवस्था पर दिखता है, तो उसमें भारत प्रमुख है। मिडिल-ईस्ट तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध और वैश्विक अनिश्चितता ने भारतीय बाजार, रुपये और आम आदमी की जेब पर गहरा असर डाला है। सवाल यही है कि आखिर क्यों हर अंतरराष्ट्रीय संकट का आर्थिक बोझ भारत को उठाना पड़ता है और इससे निकलने का रास्ता क्या हो सकता है।
तेल पर निर्भरता बनी सबसे बड़ी कमजोरी
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयातित कच्चे तेल के जरिए पूरा करता है। जैसे ही पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है, तेल की कीमतों में उछाल आ जाता है और इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। महंगा तेल केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि ट्रांसपोर्ट, खेती, उद्योग और रोजमर्रा के सामान तक महंगाई पहुंचा देता है। यही वजह है कि वैश्विक संकट भारत में महंगाई का बड़ा कारण बन जाता है।
डॉलर मजबूत, रुपया कमजोर
वैश्विक संकट के समय निवेशक सुरक्षित विकल्प की तलाश में डॉलर की तरफ भागते हैं। इससे अमेरिकी मुद्रा मजबूत होती है और भारतीय रुपया दबाव में आ जाता है। रुपये की कमजोरी का मतलब है कि भारत को तेल और अन्य जरूरी आयात के लिए ज्यादा भुगतान करना पड़ता है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता है और आयातित महंगाई देश की आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर देती है।
विदेशी निवेशकों का खेल और बाजार में गिरावट
जब दुनिया में युद्ध या तनाव बढ़ता है, तो विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालकर अमेरिका जैसे सुरक्षित बाजारों में निवेश करने लगते हैं। इसका असर भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट के रूप में दिखाई देता है। बाजार गिरने से निवेशकों का भरोसा कमजोर होता है और कंपनियों के विस्तार की रफ्तार धीमी पड़ जाती है। इसका असर रोजगार और आर्थिक विकास दोनों पर दिखाई देता है।
एक्सपोर्ट पर बढ़ता संकट
वैश्विक तनाव का असर समुद्री व्यापार और सप्लाई चेन पर भी पड़ता है। युद्ध या असुरक्षा के माहौल में शिपिंग कॉस्ट और इंश्योरेंस कई गुना बढ़ जाते हैं। इससे भारतीय उत्पाद विदेशों तक महंगे पहुंचते हैं और उनकी मांग घटने लगती है। नतीजतन एक्सपोर्ट कमजोर पड़ता है और देश में विदेशी मुद्रा का प्रवाह कम हो जाता है।
भारत को अब क्या करना चाहिए?
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में तेजी से आत्मनिर्भर बनना होगा। इलेक्ट्रिक वाहन, एथेनॉल ब्लेंडिंग, सौर ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे विकल्पों को बड़े स्तर पर बढ़ावा देना जरूरी है। साथ ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार में रुपये आधारित लेनदेन को बढ़ाकर डॉलर पर निर्भरता कम करनी होगी। घरेलू निवेशकों को मजबूत बनाना और भारत को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब में बदलना भी जरूरी है ताकि वैश्विक संकटों का असर सीमित किया जा सके।
आत्मनिर्भरता ही सबसे बड़ा बचाव
भारत के सामने चुनौती सिर्फ महंगाई या शेयर बाजार की नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता की है। अगर देश को वैश्विक संकटों के असर से बचाना है, तो ऊर्जा, निवेश और उत्पादन के क्षेत्र में मजबूत रणनीति अपनानी होगी। आने वाले वर्षों में आत्मनिर्भर भारत की दिशा में उठाए गए कदम ही तय करेंगे कि दुनिया की जंग का असर भारत पर कितना पड़ेगा।