दुनिया की राजनीति और कारोबार में इन दिनों भारत का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है। जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप टैरिफ बढ़ाने की रणनीति में उलझे रहे, उसी दौरान भारत ने यूरोपीय संघ के साथ बड़ा व्यापार समझौता कर लिया। इस मुक्त व्यापार समझौते को अब तक का सबसे अहम सौदा माना जा रहा है। इसका मकसद भारत के निर्यात को नए बाजार देना और अमेरिकी दबाव से निकलने का रास्ता बनाना है। यही वजह है कि इस समझौते के ऐलान के साथ ही अमेरिका की बेचैनी खुलकर सामने आने लगी।
टैरिफ दबाव से बचने का भारत का रास्ता
अमेरिका ने भारत पर पहले भारी टैरिफ लगाए और बाद में उन्हें और बढ़ा दिया। मकसद साफ था कि भारतीय कंपनियों की अमेरिकी बाजार तक पहुंच मुश्किल हो जाए। लेकिन भारत ने इसका जवाब नई रणनीति से दिया। ओमान और न्यूजीलैंड के बाद अब यूरोपीय संघ से समझौता इसी योजना का हिस्सा है। भारत ने अपने निर्यात के रास्ते बढ़ाए ताकि किसी एक देश पर निर्भरता कम हो। इस कदम से अमेरिकी टैरिफ का असर सीमित रह गया और भारत की अर्थव्यवस्था की रफ्तार बनी रही।
अमेरिकी नेताओं की तीखी प्रतिक्रिया
भारत-यूरोप समझौते से पहले ही अमेरिका के शीर्ष अधिकारियों के बयान सामने आने लगे थे। अमेरिकी वित्त मंत्री ने इस समझौते पर नाराजगी जताते हुए कहा कि यूरोपीय देश अपने ही खिलाफ चल रही लड़ाई को फंड कर रहे हैं। इससे साफ दिखा कि अमेरिका को यह सौदा कितना चुभ रहा है। इससे पहले भी उन्होंने रूस से तेल खरीद को लेकर भारत पर सवाल उठाए थे और उसी आधार पर अतिरिक्त टैरिफ को सही ठहराया था।
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अमेरिका को सबसे बड़ा झटका क्यों
अब तक अमेरिका भारत का सबसे बड़ा बाजार रहा है। ट्रंप प्रशासन ने ऊंचे टैरिफ लगाकर इसी रिश्ते पर दबाव बनाया। लेकिन भारत ने चाल बदल दी। यूरोपीय संघ के साथ समझौते से भारत को सीधे 27 देशों के बड़े बाजार में आसान पहुंच मिल गई। यह वही बाजार है जहां खपत बहुत ज्यादा है। इससे भारतीय कंपनियों को नए मौके मिलेंगे और अमेरिकी बाजार पर निर्भरता घटेगी। यही बात अमेरिका के लिए सबसे बड़ा झटका मानी जा रही है।
डॉलर की पकड़ पर भी असर की आशंका
भारत और यूरोप की बढ़ती साझेदारी सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है। अगर भविष्य में यह लेनदेन यूरो या दूसरी स्थानीय मुद्राओं में होता है तो अमेरिकी डॉलर की पकड़ कमजोर हो सकती है। यह बात अमेरिका को पहले से परेशान कर रही है क्योंकि कई देश पहले ही डॉलर के बजाय अपनी मुद्राओं में कारोबार करने लगे हैं। भारत-यूरोप समझौता इस दिशा में एक और मजबूत कदम माना जा रहा है।
भारत-यूरोप समझौते के बड़े फायदे
इस समझौते से भारत को कई सीधे फायदे मिलेंगे। यूरोपीय कारों पर लगने वाला शुल्क धीरे-धीरे घटेगा और यूरोप से आने वाले करीब 90 प्रतिशत सामान सस्ते हो सकते हैं। मशीनरी रसायन दवाइयां विमान और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों पर शुल्क कम या खत्म हो सकता है। इससे भारत में उपभोक्ताओं को फायदा होगा और व्यापार बढ़ेगा। कुल मिलाकर यह समझौता भारत के लिए आर्थिक मजबूती का रास्ता खोलता है और अमेरिका की चिंता की असली वजह भी यही है।