India-Germany Submarine Deal---भारत और जर्मनी के बीच रक्षा क्षेत्र का एक बड़ा समझौता जल्द होने की संभावना है। करीब 9 अरब डॉलर के इस सौदे के तहत भारत जर्मनी की थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स से छह डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां खरीदेगा। खास बात यह है कि इन पनडुब्बियों का निर्माण तकनीक हस्तांतरण के साथ मुंबई के मझगांव डॉक में किया जाएगा। यह सौदा भारतीय नौसेना के पुराने पारंपरिक पनडुब्बी बेड़े को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
दो दशक से अटका प्रोजेक्ट अब आगे बढ़ने की उम्मीद
प्रोजेक्ट 75आई के तहत छह पनडुब्बियों की खरीद का प्रस्ताव लंबे समय से चर्चा में रहा है। अब भारत और जर्मनी के बीच करीब 9 अरब डॉलर का समझौता अगले कुछ हफ्तों में होने की संभावना बताई जा रही है। जर्मनी की थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स ने कीमत और तकनीक हस्तांतरण के मामले में बेहतर प्रस्ताव देकर रूस, दक्षिण कोरिया, फ्रांस और स्पेन की कंपनियों को पीछे छोड़ा है।
पुराने पनडुब्बी बेड़े को बदलना बड़ी जरूरत
भारतीय नौसेना के पारंपरिक पनडुब्बी बेड़े की उम्र लगातार बढ़ रही है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, कई एसएसके पनडुब्बियां 25 साल से ज्यादा पुरानी हो चुकी हैं। 1999 में शुरू की गई 30 साल की योजना में 24 पारंपरिक पनडुब्बियां शामिल करने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन अब तक सिर्फ छह पनडुब्बियां ही हासिल हो सकी हैं। ऐसे में नई पनडुब्बियों की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है।
AIP तकनीक से पानी के भीतर बढ़ेगी क्षमता
प्रस्तावित पनडुब्बियां टाइप-214 डिजाइन के बड़े संस्करण पर आधारित होंगी। इनमें हाइड्रोजन फ्यूल सेल आधारित एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी AIP सिस्टम होने की बात कही गई है। यह तकनीक पनडुब्बी को लंबे समय तक पानी के भीतर रहने में मदद करती है। इन पनडुब्बियों में टॉरपीडो और एंटी-शिप मिसाइल जैसी मारक क्षमताएं होंगी। इनके जरिए हिंद महासागर क्षेत्र में निगरानी और एरिया-डिनायल जैसे मिशन भी किए जा सकेंगे।
मझगांव डॉक में निर्माण से बढ़ेगा तकनीकी अनुभव
इस सौदे की खास बात सिर्फ पनडुब्बियों की खरीद नहीं, बल्कि तकनीक का भारत में हस्तांतरण भी है। छह पनडुब्बियों का निर्माण मुंबई स्थित मझगांव डॉक में किया जाना है। इससे भारतीय रक्षा उत्पादन क्षमता को बढ़ाने और पारंपरिक पनडुब्बियों के निर्माण में देश का अनुभव मजबूत करने का अवसर मिलेगा। पहले जहाज की डिलीवरी 2030 के दशक की शुरुआत में होने की उम्मीद है। सौदे में तीन अतिरिक्त पनडुब्बियां खरीदने का विकल्प भी बताया गया है।
जर्मनी पर लंबी निर्भरता को लेकर उठ सकते हैं सवाल
छह पनडुब्बियों का सौदा भारत को लंबे समय तक जर्मन तकनीक, स्पेयर पार्ट्स और सपोर्ट सिस्टम से जोड़ सकता है। इसी वजह से भविष्य में राजनीतिक परिस्थितियों के बदलने से पैदा होने वाले जोखिमों पर भी विचार जरूरी माना जा रहा है। सरकार-से-सरकार समझौता कुछ सुरक्षा जरूर देता है, लेकिन लंबे समय की रणनीतिक निर्भरता को लेकर सावधानी की जरूरत होगी। भारत के लिए यह सौदा सिर्फ पनडुब्बियां हासिल करने का नहीं, बल्कि तकनीकी आत्मनिर्भरता और समुद्री सुरक्षा क्षमता बढ़ाने का भी अवसर हो सकता है।