अमेरिका में मिडटर्म चुनाव के नतीजों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक स्थिति को झटका दिया है। डेमोक्रेटिक पार्टी के मजबूत प्रदर्शन के बाद अब अमेरिकी राजनीति में सत्ता का संतुलन बदलने के संकेत मिल रहे हैं। इस घटनाक्रम पर भारत भी करीब से नजर रख रहा है, क्योंकि पिछले कुछ समय से नई दिल्ली और वॉशिंगटन के रिश्तों में कई मुद्दों को लेकर तनाव देखने को मिला है। इनमें व्यापारिक टैरिफ, रूस से भारत की तेल खरीद, पाकिस्तान के साथ ट्रंप प्रशासन के संबंध और भारतीय पेशेवरों के लिए वीजा नीतियां प्रमुख हैं।
द्विपक्षीय संबंधों में असहजता बढ़ी
भारत और अमेरिका दुनिया के दो बड़े लोकतंत्र होने के साथ-साथ रणनीतिक साझेदार भी हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा, तकनीक, व्यापार और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग लगातार महत्वपूर्ण रहा है। हालांकि, ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में कुछ ऐसे फैसले और बयान सामने आए, जिनसे द्विपक्षीय संबंधों में असहजता बढ़ी। अब सवाल है कि मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को मिले झटके के बाद क्या ट्रंप प्रशासन भारत के प्रति अपना रुख बदलेगा या दोनों देशों के रिश्तों में तनाव बना रहेगा?
पाकिस्तान को लेकर ट्रंप का रुख बना भारत की चिंता
भारत-अमेरिका संबंधों में हालिया असहजता की एक बड़ी वजह पाकिस्तान को लेकर ट्रंप प्रशासन का रवैया रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के साथ करीबी संबंधों का सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन किया। भारत और पाकिस्तान के बीच मई 2025 में सैन्य तनाव के बाद हुए संघर्षविराम का श्रेय भी ट्रंप ने कई बार खुद लिया।
10 मई 2025 को ट्रंप ने दावा किया था कि उनकी मध्यस्थता से भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य टकराव समाप्त हुआ। उन्होंने यह भी कहा था कि दोनों देशों के बीच संघर्ष परमाणु युद्ध तक पहुंच सकता था, जिसे रोकने में उनकी भूमिका रही। हालांकि, भारत ने लगातार किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता के दावे को खारिज किया है। नई दिल्ली का रुख रहा है कि भारत और पाकिस्तान के बीच किसी भी मुद्दे पर बातचीत द्विपक्षीय आधार पर ही हो सकती है।
पाकिस्तान की ओर से ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किए जाने के बाद भी यह मुद्दा चर्चा में रहा। भारत के लिए चिंता की बात यह है कि वॉशिंगटन का इस्लामाबाद के साथ बढ़ता संपर्क क्षेत्रीय रणनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
टैरिफ और रूस से तेल खरीद पर भी बढ़ा तनाव
भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों में भी पिछले कुछ समय में खींचतान देखने को मिली है। ट्रंप प्रशासन ने रूस से कच्चा तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने का दबाव बनाया। अमेरिकी प्रशासन का तर्क रहा कि रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखने से मॉस्को को यूक्रेन युद्ध में आर्थिक मदद मिलती है।
भारत ने इस मामले में अपना पक्ष स्पष्ट रखा है। नई दिल्ली का कहना है कि ऊर्जा सुरक्षा और देश के नागरिकों के हित उसकी प्राथमिकता हैं। भारत अपनी जरूरतों और बाजार की परिस्थितियों के अनुसार ऊर्जा खरीद के फैसले करता है। रूस से तेल आयात भी इसी नीति का हिस्सा है।
अमेरिकी दबाव की नीति पर सवाल उठे
इस बीच ट्रंप ने रूस के साथ ऊर्जा खरीद से जुड़ी व्यवस्था को लेकर भी कदम उठाए, जिससे भारत के खिलाफ अमेरिकी दबाव की नीति पर सवाल उठे। नई दिल्ली के लिए यह संदेश स्पष्ट था कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा नीति में भारत अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देगा।