मजदूर दिवस के मौके पर सामने आए आंकड़ों ने एक बड़ी सच्चाई उजागर की है, देश के अलग-अलग राज्यों में मजदूरी में भारी अंतर है। हर राज्य अपनी आर्थिक स्थिति, महंगाई और उद्योगों के आधार पर मजदूरी तय करता है। यही वजह है कि दिल्ली जैसे बड़े शहरों में काम करने वाले मजदूर ज्यादा कमाते हैं, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में मजदूरी काफी कम है। इस अंतर के कारण बड़ी संख्या में मजदूर बेहतर कमाई की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख करते हैं।
दिल्ली-हरियाणा में सबसे ज्यादा कमाई
अगर सबसे ज्यादा मजदूरी की बात करें, तो दिल्ली इस मामले में सबसे आगे है। यहां एक मजदूर औसतन 1,300 रुपये से ज्यादा रोज कमा सकता है, जिससे उसकी मासिक आय करीब 35,000 रुपये तक पहुंच जाती है। इसका कारण यहां की सख्त न्यूनतम वेतन नीति और बेहतर काम के अवसर हैं। वहीं हरियाणा भी पीछे नहीं है, खासकर गुरुग्राम जैसे औद्योगिक शहरों में मजदूरों को अच्छी कमाई मिलती है। यहां कंस्ट्रक्शन और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में मजदूरी देश के औसत से काफी ज्यादा है।
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दक्षिण राज्यों में मजदूरों की मांग ज्यादा
दक्षिण भारत के राज्य भी मजदूरों के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। केरल में मजबूत लेबर यूनियन के कारण मजदूरों को न केवल अच्छी मजदूरी मिलती है, बल्कि काम करने की बेहतर सुविधाएं भी मिलती हैं। इसी तरह कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में औद्योगिक विकास के चलते मजदूरों की कमाई 30,000 रुपये से ऊपर तक पहुंच जाती है। यही वजह है कि उत्तर भारत से बड़ी संख्या में लोग इन राज्यों में काम करने जाते हैं।
पलायन और भविष्य की चुनौती
मजदूरी में इस असमानता का सीधा असर मजदूरों के पलायन पर पड़ता है। कम कमाई वाले राज्यों से लोग बेहतर अवसरों की तलाश में बड़े शहरों और विकसित राज्यों की ओर जा रहे हैं। इससे एक तरफ महानगरों में भीड़ बढ़ती है, तो दूसरी तरफ छोटे राज्यों में श्रमिकों की कमी हो जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सभी राज्यों में संतुलित मजदूरी नीति लागू की जाए, तो मजदूरों का जीवन स्तर बेहतर हो सकता है और पलायन की समस्या भी कम हो सकती है।