वैश्विक राजनीति और व्यापारिक दबावों के बीच भारत की तेल नीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। रूस से कच्चे तेल की खरीद में भारी कटौती के बाद अब सऊदी अरब एक बार फिर भारत का शीर्ष तेल आपूर्तिकर्ता बन गया है। यह बदलाव ऐसे समय में हुआ है जब भारत-अमेरिका संबंधों में टैरिफ को लेकर तनाव और बातचीत का दौर चला।
भारत-अमेरिका तनाव और टैरिफ का असर
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से तेल खरीद को लेकर नाराजगी जताते हुए भारत पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया था। इससे भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच व्यापारिक तनाव बढ़ गया। बाद में एक समझौते के तहत भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल की खरीद कम करने पर टैरिफ हटाया गया और रेसिप्रोकल टैरिफ घटाकर 18% कर दिया गया।
रूस से आयात में तेज गिरावट
जनवरी के आंकड़ों ने साफ कर दिया कि रूस से भारत की तेल खरीद में बड़ी गिरावट आई है। रूस से मर्चेंडाइज आयात सालाना आधार पर 40 प्रतिशत से ज्यादा घट गया। इसका मुख्य कारण भारतीय रिफाइनरियों द्वारा रूसी कच्चे तेल की खरीद में कटौती रहा, क्योंकि कुल आयात में कच्चे तेल की हिस्सेदारी करीब 80 प्रतिशत थी।
सऊदी अरब की वापसी
मध्य-पूर्व से तेल आयात बढ़ने के साथ सऊदी अरब एक बार फिर भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया है। जनवरी में इस क्षेत्र से आयात 2022 के बाद सबसे अधिक रहा। संकेत मिल रहे हैं कि फरवरी में सऊदी अरब से तेल आयात रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है।
रूस की हिस्सेदारी घटी
कुछ समय पहले तक भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत तक पहुंच गई थी, लेकिन अब यह घटकर लगभग 21 प्रतिशत रह गई है। जनवरी में रूस से आयात करीब 11 लाख बैरल प्रतिदिन रहा, जो पिछले साल की तुलना में एक-तिहाई कम है। यह गिरावट भारत की बदली हुई रणनीति को दर्शाती है।
OPEC देशों की भूमिका और आगे की राह
रूस से कम खरीद के कारण OPEC देशों की हिस्सेदारी भारत के तेल आयात में 11 महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गई है। विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में रूस से आयात और घट सकता है, लेकिन भारत इसे अचानक पूरी तरह बंद नहीं करेगा। साफ है कि भारत संतुलन बनाते हुए वैश्विक दबावों के बीच अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी करने की रणनीति अपना रहा है।