मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और महंगे ऊर्जा आयात ने भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ा दिया है। Reserve Bank of India के सामने अब रुपये को स्थिर रखने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। हाल के दिनों में रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुंच गया है, जिससे बाजार और निवेशकों की चिंता बढ़ गई है। यही हाल Japan की करेंसी येन का भी है, जिसने डॉलर के मुकाबले काफी कमजोरी दिखाई है।
क्यों बढ़ रहा है दबाव
रुपये पर सबसे बड़ा असर बढ़ती तेल कीमतों और विदेशी निवेशकों की निकासी का पड़ रहा है। Strait of Hormuz में तनाव के कारण ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने का खतरा बना हुआ है, जिससे आयात बिल बढ़ रहा है। दूसरी ओर, विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालकर डॉलर में निवेश कर रहे हैं, जिससे रुपया और कमजोर हो रहा है। यह स्थिति फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं में भी देखी जा रही है।
RBI के सामने कठिन विकल्प
रिजर्व बैंक के पास अब सीमित विकल्प बचे हैं। अगर वह ब्याज दरें बढ़ाता है, तो महंगाई पर काबू पाया जा सकता है और रुपये को सहारा मिल सकता है, लेकिन इससे लोन महंगे हो जाएंगे और आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। दूसरी ओर, अगर दरें नहीं बढ़ाई जातीं, तो पूंजी का बहिर्वाह तेज हो सकता है और रुपया और गिर सकता है। यही दुविधा जापान के केंद्रीय बैंक के सामने भी बनी हुई है।
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बैंकों और लोन मार्केट पर असर
रुपये की कमजोरी का असर बैंकिंग सेक्टर पर भी दिख सकता है। महंगे कर्ज और बढ़ती लागत के कारण लोन की मांग घट सकती है। खासकर MSME सेक्टर, जो पहले से दबाव में है, उसके लिए हालात और मुश्किल हो सकते हैं। बैंकों को संभावित खराब कर्ज (NPA) के लिए पहले से तैयारी करनी पड़ सकती है, जिससे लोन देने में सख्ती बढ़ेगी।
आगे क्या हो सकता है
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो स्थिति और बिगड़ सकती है। ब्याज दरों में बढ़ोतरी, विदेशी निवेश को आकर्षित करने के उपाय और महंगाई पर नियंत्रण—ये तीनों कदम जरूरी हो सकते हैं। आने वाले महीनों में आरबीआई की नीतियां तय करेंगी कि रुपया स्थिर होता है या दबाव और बढ़ता है।