अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियां एक बार फिर चर्चा में हैं। साल 2025 में बड़े टैरिफ फैसलों के बाद अब ट्रंप प्रशासन ने रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर सख्त रुख अपनाने का संकेत दिया है। अमेरिका ने ऐसा कानून मंजूर किया है, जिसके तहत रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाया जा सकता है। इसी बीच सवाल उठने लगा है कि क्या भारत भी इस दायरे में आ सकता है।
दावोस में अमेरिकी वित्त मंत्री का बयान
दावोस में हुए वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने रूसी तेल खरीद को लेकर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि कुछ देश आज भी रूस से तेल खरीदकर अप्रत्यक्ष रूप से युद्ध को आर्थिक मदद दे रहे हैं। खासतौर पर उन्होंने यूरोपीय देशों पर सवाल उठाए और कहा कि अमेरिका इस मुद्दे पर आगे बढ़ रहा है।
क्या है सैंक्शनिंग रशिया एक्ट 2025
ट्रंप प्रशासन ने सैंक्शनिंग रशिया एक्ट 2025 को मंजूरी दी है। इस कानून के तहत रूस से तेल आयात करने वाले देशों के सामान पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकता है। यह प्रस्ताव अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने पेश किया है। माना जा रहा है कि इसका सीधा असर चीन, भारत और ब्राजील जैसे देशों पर पड़ सकता है, जो रूसी तेल के बड़े खरीदार रहे हैं।
ये भी पढ़ें : Dollar के सामने ढहता रुपया, पहली बार 91 पार, रिकॉर्ड गिरावट से मची हलचल, जानिए आपकी जेब पर कितना पड़ेगा असर
भारत को लेकर क्या बोले स्कॉट बेसेंट
अमेरिकी वित्त मंत्री ने भारत का जिक्र करते हुए कहा कि यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रूसी तेल खरीदा था। इसके बाद अमेरिका ने भारत पर पहले से लागू 25 प्रतिशत टैरिफ के साथ अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया। बेसेंट के मुताबिक, इस फैसले के बाद भारत ने रूसी तेल की खरीद कम कर दी और बाद में इसे रोक दिया। इससे संकेत मिलता है कि भारत फिलहाल 500 प्रतिशत टैरिफ के दायरे से बाहर रह सकता है।
चीन पर क्यों बढ़ सकती है सख्ती
चीन रूसी तेल का सबसे बड़ा खरीदार माना जाता है। इसके अलावा वह ईरान और वेनेजुएला से भी तेल खरीदता है। स्कॉट बेसेंट ने कहा कि वेनेजुएला के तेल सेक्टर पर अब ट्रंप प्रशासन का नियंत्रण बढ़ गया है, जिससे चीन को सस्ते दाम पर तेल मिलना मुश्किल होगा। इससे साफ है कि आने वाले समय में चीन पर दबाव और बढ़ सकता है।
आगे क्या होगा भारत के लिए असर
फिलहाल अमेरिकी वित्त मंत्री के बयान से भारत के लिए राहत के संकेत मिलते हैं। हालांकि अंतिम फैसला अमेरिकी सीनेट और राष्ट्रपति ट्रंप पर निर्भर करेगा। अगर कानून पूरी तरह लागू होता है तो वैश्विक व्यापार पर बड़ा असर पड़ सकता है। भारत के लिए जरूरी होगा कि वह ऊर्जा जरूरतों और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच संतुलन बनाकर आगे की रणनीति तय करे।