F-35 Sukhoi Technology Secrets : तरंग शक्ति अभ्यास के दौरान अमेरिकी F-35 स्टील्थ लड़ाकू विमान को लेकर एक ऐसी बात सामने आई, जिसने भारत और अमेरिका के सैन्य सहयोग पर चर्चा तेज कर दी। भारतीय वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह के मुताबिक, अमेरिकी पक्ष ने भारतीय अधिकारियों को F-35 के करीब जाने और उसका कॉकपिट देखने की अनुमति नहीं दी। हालांकि, करीबी फॉर्मेशन में उड़ान भरने की अनुमति दी गई थी। अमेरिकी पैसिफिक एयर फोर्सेज के कमांडर जनरल केविन श्नाइडर ने कहा कि F-35 जैसे अत्याधुनिक विमान से जुड़ी सुरक्षा व्यवस्था तय करती है कि कौन-सी जानकारी साझा की जा सकती है। यानी सैन्य अभ्यास में दोस्ती अपनी जगह है, लेकिन तकनीक के सबसे संवेदनशील राज अलग रखे जाते हैं।
2008 में भारत ने भी अपनाई थी यही नीति
अमेरिका के इस रवैये को समझने के लिए 2008 के रेड फ्लैग अभ्यास को याद करना जरूरी है। उस समय भारतीय वायु सेना अपने Su-30 MKI लड़ाकू विमानों के साथ अमेरिका पहुंची थी। ये विमान भारतीय वायु सेना के सबसे आधुनिक लड़ाकू विमानों में शामिल थे। भारत ने भी अपने विमानों की संवेदनशील तकनीक को सुरक्षित रखने के लिए कई सावधानियां बरती थीं। खास तौर पर विमान में लगे बार्स रडार की पूरी क्षमताओं और उसकी संवेदनशील जानकारी तक पहुंच सीमित रखी गई थी। इससे साफ होता है कि सैन्य अभ्यास में शामिल होना और अपनी तकनीक के सारे राज खोल देना दो अलग बातें हैं।
सुखोई के रडार को लेकर भारत ने क्यों बरती सावधानी?
रेड फ्लैग अभ्यास के दौरान भारत ने Su-30 MKI के बार्स रडार की पूरी क्षमता का इस्तेमाल नहीं किया था। रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी जानकारी और बाद की रिपोर्टों के मुताबिक, रडार से जुड़ी संवेदनशील तकनीकी जानकारी को सुरक्षित रखना इसकी अहम वजह थी। रडार की आवृत्तियों और उसकी कार्यप्रणाली की जानकारी विरोधी के हाथ लगने पर भविष्य में विमान को निशाना बनाने या उसकी प्रणालियों में बाधा डालने में मदद मिल सकती है। इसलिए भारत ने अभ्यास में हिस्सा लेने के बावजूद अपनी तकनीक की सुरक्षा को प्राथमिकता दी।
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अमेरिकी अधिकारी ने सुखोई को लेकर क्या दावा किया था?
2008 के रेड फ्लैग अभ्यास के बाद अमेरिकी वायु सेना के कर्नल टेरेंस फॉर्नोफ की एक निजी ब्रीफिंग का वीडियो सामने आया था। इसमें उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी F-15 पायलटों ने एक-बनाम-एक मुकाबलों में Su-30 MKI पर बढ़त बनाई थी। उन्होंने सुखोई के प्रदर्शन, इंजन से जुड़ी समस्याओं और अभ्यास के दौरान हुई घटनाओं पर भी सवाल उठाए थे। हालांकि, ये उनके निजी ब्रीफिंग में किए गए दावे थे। अमेरिकी वायु सेना ने बाद में स्पष्ट किया कि ये आधिकारिक बयान नहीं थे। इसलिए इन दावों को पूरे अभ्यास के निर्विवाद नतीजे के रूप में देखना सही नहीं होगा।
भारतीय वायु सेना ने दावों पर क्या कहा?
फॉर्नोफ के दावों के बाद भारतीय पक्ष ने अलग तस्वीर पेश की थी। भारतीय अधिकारियों ने कहा था कि मुकाबलों में दोनों पक्षों के पास उपलब्ध रडार, सूचना और दूसरे तकनीकी साधनों में अंतर था। भारतीय पायलटों के पास उस समय अमेरिकी विमानों जैसी सभी नेटवर्क आधारित सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। भारतीय पक्ष ने सुखोई के प्रदर्शन और मिशन की सफलता को लेकर भी अपने आंकड़े सामने रखे थे। ऐसे में केवल एक अधिकारी की टिप्पणी के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना मुश्किल है कि किस विमान ने हर परिस्थिति में बेहतर प्रदर्शन किया। हवाई मुकाबले का नतीजा पायलटों के कौशल के साथ-साथ तकनीक, सूचना और अभ्यास के नियमों पर भी निर्भर करता है।
दोनों घटनाओं से क्या सबक मिलता है?
तरंग शक्ति 2026 में F-35 तक सीमित पहुंच और 2008 में सुखोई के रडार की सुरक्षा, दोनों घटनाएं सैन्य तकनीक की गोपनीयता का महत्व दिखाती हैं। अमेरिका अपने स्टील्थ विमान की संवेदनशील प्रणालियों की जानकारी सीमित रखता है, तो भारत भी अपने लड़ाकू विमानों की अहम तकनीक की सुरक्षा करता है। इसका मतलब यह नहीं कि दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग नहीं है। अभ्यास में पायलट एक-दूसरे के विमानों की उड़ान, रणनीति और संचालन से सीख सकते हैं, जबकि गोपनीय तकनीक तक पहुंच नियंत्रित रहती है। भारत के लिए यह सहयोग अपनी वायु सेना की क्षमता बढ़ाने और भविष्य के आधुनिक लड़ाकू विमानों की जरूरतों को समझने का अवसर भी है।