मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बाद भारत ने एलपीजी आपूर्ति को लेकर अपनी रणनीति बदलनी शुरू कर दी है। रिपोर्टों के मुताबिक, सरकारी तेल कंपनियां अब अमेरिका से सालाना करीब 22 लाख टन एलपीजी आयात करने की तैयारी में हैं। इसका उद्देश्य खाड़ी देशों पर निर्भरता कम करना और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाना है। इसके साथ ही भारत अल्जीरिया, अर्जेंटीना, नाइजीरिया, नॉर्वे और मलेशिया जैसे नए देशों से भी गैस आयात के विकल्प तलाश रहा है। माना जा रहा है कि इससे भविष्य में किसी भी वैश्विक संकट के दौरान आपूर्ति प्रभावित होने का खतरा कम होगा।
अमेरिका बना सबसे बड़ा सप्लायर
अमेरिका पहले भी भारत को एलपीजी निर्यात करता रहा है, लेकिन हाल के महीनों में उसकी हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में भारत के कुल एलपीजी आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी 8 प्रतिशत से भी कम थी। वहीं 2026 में यह लगातार बढ़ती गई और जून तक करीब 65 प्रतिशत पहुंच गई। होर्मुज जलडमरूमध्य से आपूर्ति प्रभावित होने के दौरान अमेरिका भारत के लिए सबसे बड़ा एलपीजी सप्लायर बनकर उभरा। इससे घरेलू बाजार में गैस की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिली।
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घरेलू उत्पादन भी बढ़ाया गया
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में बताया कि संकट के दौरान सरकार ने रिफाइनरियों को औद्योगिक गैस की जगह अधिक एलपीजी उत्पादन करने के निर्देश दिए थे। इसके चलते देश में एलपीजी उत्पादन लगभग 35 हजार मीट्रिक टन प्रतिदिन से बढ़कर 54 हजार मीट्रिक टन प्रतिदिन तक पहुंच गया। सरकार का मानना है कि घरेलू उत्पादन बढ़ाने और आयात के नए स्रोत तैयार करने से भविष्य में किसी भी आपूर्ति संकट का बेहतर तरीके से सामना किया जा सकेगा।
30 दिन का रणनीतिक रिजर्व बनाने की तैयारी
पेट्रोलियम मंत्रालय ने तेल विपणन कंपनियों को 30 दिन का रणनीतिक एलपीजी रिजर्व तैयार करने की दिशा में भी काम शुरू करने को कहा है। यह रिजर्व मौजूदा 45 दिन के नियमित स्टॉक के अतिरिक्त होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका सहित कई देशों से एलपीजी आयात बढ़ाने और रणनीतिक भंडार तैयार करने से भारत की ऊर्जा सुरक्षा और मजबूत होगी। इससे खाड़ी क्षेत्र में किसी भी भू-राजनीतिक संकट का असर देश की गैस आपूर्ति पर कम पड़ने की संभावना रहेगी।