भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर सियासत तेज हो गई है। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने केंद्र सरकार पर एकतरफा समझौता करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि अमेरिकी अदालत के फैसले का इंतजार किए बिना अंतरिम डील करना राष्ट्रीय हितों के खिलाफ हो सकता है। वहीं सरकार पर रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता करने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं।
टैरिफ फैसले के बाद सियासी तूफान
अमेरिका की शीर्ष अदालत ने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए ग्लोबल टैरिफ को रद्द कर दिया। अदालत ने 6-3 के फैसले में कहा कि 1977 के IEEPA कानून के तहत बड़े पैमाने पर टैरिफ लगाना अधिकारों का दुरुपयोग था। इस निर्णय के बाद भारत में भी राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है।
राहुल गांधी का आरोप—‘फिर होगा सरेंडर’
राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री दोबारा बातचीत में देश का पक्ष मजबूती से नहीं रख पाएंगे। उनका दावा है कि यह समझौता भारत की आर्थिक और रणनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकता है। उन्होंने इसे “विश्वासघात” बताते हुए पारदर्शिता की मांग की।
खड़गे के सवाल—किसके दबाव में हुई डील?
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने पूछा कि अमेरिकी अदालत के फैसले से पहले अंतरिम डील क्यों की गई। उन्होंने जॉइंट स्टेटमेंट में जीरो टैरिफ, 500 बिलियन डॉलर के आयात, कृषि बाजार खोलने और रूसी तेल खरीद पर रोक जैसे बिंदुओं पर चिंता जताई। उनका सवाल है कि क्या सरकार ने किसी बाहरी दबाव में यह कदम उठाया?
राष्ट्रीय हित बनाम कूटनीतिक संतुलन
कांग्रेस का कहना है कि किसी भी ट्रेड डील में किसानों, मजदूरों और छोटे व्यापारियों के हित सर्वोपरि होने चाहिए। पार्टी ने सरकार से स्पष्ट जवाब देने और संसद में विस्तृत चर्चा कराने की मांग की है। अब यह मुद्दा आने वाले दिनों में बड़े राजनीतिक विमर्श का रूप ले सकता है।