भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता के बीच बड़ा मोड़ आ गया है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति Donald Trump की टैरिफ नीति को अवैध ठहराते हुए कार्यपालिका की शक्तियों पर रोक लगा दी है। इस फैसले के बाद ट्रेड समीकरण बदल गए हैं और भारत को अब फ्रेमवर्क एग्रीमेंट में मौजूद प्रावधानों के जरिए अपनी शर्तों को मजबूत करने का अवसर मिल सकता है। वॉशिंगटन यात्रा टलने के बाद नई रणनीति पर मंथन तेज है।
IEEPA पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, टैरिफ रणनीति ध्वस्त
अमेरिका की सर्वोच्च अदालत ने 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत लगाए गए टैरिफ को अवैध माना है। यही वह कानून था, जिसके जरिए ट्रंप प्रशासन ने भारत समेत कई देशों पर ‘रेसिप्रोकल टैरिफ’ लगाए थे। फैसले के बाद स्पष्ट हो गया है कि कार्यपालिका इस प्रावधान के तहत मनमाने ढंग से टैरिफ नहीं लगा सकती। इससे भारत पर लगाए गए अतिरिक्त शुल्क की वैधता भी खत्म हो गई है।
फ्रेमवर्क एग्रीमेंट का क्लॉज बनेगा भारत की ताकत
हाल ही में घोषित भारत-अमेरिका ट्रेड फ्रेमवर्क में एक अहम प्रावधान है—यदि किसी देश के तय टैरिफ में बदलाव होता है, तो दूसरा पक्ष अपनी प्रतिबद्धताओं में संशोधन कर सकता है। चूंकि अमेरिका की ओर से लगाए गए टैरिफ अब गैरकानूनी करार दिए जा चुके हैं, भारत इस क्लॉज का इस्तेमाल कर दोबारा बातचीत की मांग कर सकता है। यही प्रावधान भारत के लिए रणनीतिक हथियार साबित हो सकता है।
रूसी तेल, कृषि और डिजिटल ट्रेड पर मतभेद
तीन बड़े मुद्दों पर अभी भी स्पष्टता जरूरी है। पहला, रूसी तेल आयात को लेकर अमेरिका की व्याख्या और भारत की आधिकारिक स्थिति में अंतर है। दूसरा, अमेरिकी कृषि उत्पादों पर टैरिफ में कटौती के दावे पर स्पष्ट सहमति बननी बाकी है। तीसरा, डिजिटल ट्रेड को लेकर अमेरिका बाजार पहुंच की बात करता है, जबकि भारत डेटा सुरक्षा, नियामकीय ढांचे और संप्रभुता को प्राथमिकता देता है। इन बिंदुओं पर पुनर्विचार भारत के हित में माना जा रहा है।
ट्रंप के सीमित विकल्प, भारत के लिए अवसर
IEEPA के रास्ते बंद होने के बाद ट्रंप प्रशासन ने 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 के तहत अस्थायी टैरिफ का सहारा लिया है, जो केवल 150 दिनों के लिए मान्य हैं। इसके बाद उन्हें अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी की जरूरत होगी। ऐसे में अमेरिका की मोलभाव करने की क्षमता सीमित होती दिख रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह दौर भारत के लिए संतुलित और दीर्घकालिक व्यापार समझौते की दिशा में निर्णायक साबित हो सकता है।