भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चल रही ट्रेड डील की बातचीत एक बार फिर सुर्खियों में है। अमेरिकी कॉमर्स सेक्रेटरी हॉवर्ड लुटनिक के बयान के बाद इस मुद्दे पर नया विवाद खड़ा हो गया है। उनका दावा है कि भारत और अमेरिका के बीच तैयार ट्रेड डील सिर्फ इसलिए फाइनल नहीं हो सकी क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को व्यक्तिगत फोन कॉल नहीं किया। इस बयान के बाद दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं।
अमेरिकी बयान से बढ़ा विवाद
हॉवर्ड लुटनिक ने कहा कि अमेरिका ने इंडोनेशिया, वियतनाम और फिलीपींस जैसे देशों के साथ समझौते कर लिए, जबकि भारत के साथ डील पहले पूरी होने की उम्मीद थी। उनके मुताबिक डील का मसौदा तैयार था, लेकिन कॉल न होने से अमेरिकी नेतृत्व नाराज हुआ और बात वहीं अटक गई। इस बयान ने भारत में राजनीतिक और कारोबारी हलकों में हलचल बढ़ा दी है।
500 प्रतिशत टैरिफ का डर
इस बीच अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम के बयान ने चिंता और बढ़ा दी है। उन्होंने कहा कि रूस से तेल और ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर सख्त कार्रवाई की तैयारी है। इसके तहत भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान हो सकता है। अगर ऐसा होता है तो भारत के निर्यातकों पर इसका सीधा और गंभीर असर पड़ेगा।
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पहले से दबाव में भारतीय एक्सपोर्ट
भारतीय निर्यातक पहले ही अमेरिका की ओर से लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ से परेशान हैं। कई उद्योगों का कहना है कि इससे भारत और अमेरिका दोनों को नुकसान हो रहा है। अब अगर टैरिफ और बढ़ाया गया तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। निर्यातकों का मानना है कि अमेरिका भारत का एक बड़ा बाजार है और वहां झटका लगने से रोजगार और उत्पादन दोनों प्रभावित होंगे।
एक्सपोर्टर्स की मांग क्या है
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन के अध्यक्ष एससी रल्हन का कहना है कि दोनों देशों को बातचीत जारी रखनी चाहिए। लेदर और इंजीनियरिंग सेक्टर से जुड़े निर्यातकों ने भी कहा है कि ट्रेड एग्रीमेंट होने से अनिश्चितता कम होगी और कारोबार को स्थिरता मिलेगी। उनका मानना है कि नए बाजारों की तलाश जरूरी है, लेकिन अमेरिका की अहमियत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
असल वजह क्या है
थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव का मानना है कि इस देरी को सिर्फ एक फोन कॉल से जोड़ना सही नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार असल मुद्दा नीतिगत मतभेदों और कठिन फैसलों से जुड़ा है, जिन्हें दोनों देशों को सुलझाना होगा। अगर बातचीत ठप रही तो यह दुनिया के सबसे अहम व्यापारिक रिश्तों में से एक को कमजोर कर सकता है। ऐसे में अब सबकी नजर इस पर है कि आगे भारत और अमेरिका इस गतिरोध को कैसे तोड़ते हैं।