India Water Crisis : भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। लेकिन इस सफर में पानी की कमी बड़ी बाधा बन सकती है। जल संकट का असर केवल किसानों और आम लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि बिजली उत्पादन, मैन्युफैक्चरिंग और आधुनिक तकनीकी उद्योगों पर भी पड़ने लगा है। विशेषज्ञों की चेतावनी है कि अगर समय रहते पानी के बेहतर प्रबंधन की व्यवस्था नहीं की गई, तो आर्थिक विकास की रफ्तार प्रभावित होने के साथ महंगाई भी बढ़ सकती है।
देश के जल संसाधनों पर बढ़ता दबाव
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मुताबिक, दुनिया की करीब 18 प्रतिशत आबादी भारत में रहती है, जबकि देश के पास वैश्विक ताजे जल संसाधनों का केवल 4 प्रतिशत हिस्सा है। ऐसे में पानी की मांग और उपलब्धता के बीच अंतर लगातार चुनौती बन रहा है। कम बारिश और कमजोर मानसून के कारण कई इलाकों में खेतों की नमी प्रभावित हुई है। इसका सीधा असर रबी फसलों की बुवाई पर पड़ सकता है।
फसलों पर असर से बढ़ सकती महंगाई
महाराष्ट्र के जालना जैसे जिलों में औसत से करीब 48 प्रतिशत कम बारिश दर्ज होने का दावा किया गया है। पानी की कमी के कारण किसानों के सामने गेहूं और चने जैसी रबी फसलों की बुवाई में मुश्किलें खड़ी हो रही हैं। यदि कृषि उत्पादन घटता है तो खाद्य पदार्थों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। पहले से ही चीनी, दाल, चावल और सब्जियों की महंगाई आम लोगों के घरेलू बजट को प्रभावित कर रही है। सरकार की अक्टूबर की आर्थिक रिपोर्ट में भी दूसरी छमाही के दौरान आर्थिक गतिविधियों के साथ कीमतों में स्थिरता बनाए रखने को अहम चुनौती बताया गया है।
औद्योगिक विकास के सामने बड़ा संकट
जल संकट अब केवल खेती या पेयजल तक सीमित नहीं रह गया है। स्टील, केमिकल और कपड़ा उद्योगों के अलावा सेमीकंडक्टर फैब, फार्मास्यूटिकल्स और डेटा सेंटर जैसे आधुनिक क्षेत्रों को भी बड़ी मात्रा में पानी की जरूरत होती है। केपीएमजी के विशेषज्ञ सुमुलेंद्र घोष के मुताबिक, पानी की उपलब्धता औद्योगिक विकास को पूरी तरह नहीं रोकेगी, लेकिन यह तय कर सकती है कि कौन से औद्योगिक क्लस्टर आगे बढ़ेंगे और उन्हें कितनी लागत चुकानी होगी।
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2030 तक मांग और सप्लाई में बड़ा अंतर
नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2030 तक भारत में पानी की मांग उपलब्ध आपूर्ति से दोगुनी हो सकती है। इससे देश की जीडीपी को 6 प्रतिशत तक नुकसान पहुंचने का अनुमान है। पानी की कमी के कारण पहले भी कुछ थर्मल पावर प्लांट बंद हो चुके हैं। यदि स्थिति नहीं सुधरी तो कई क्षेत्रों में फैक्ट्रियों का संचालन और नए उद्योगों का विस्तार प्रभावित हो सकता है। आईआईटी मद्रास के विशेषज्ञों के मुताबिक, पानी की समस्या हर क्षेत्र में अलग-अलग है और इसकी उपलब्धता, गुणवत्ता तथा भरोसेमंद आपूर्ति पर निर्भर करती है।
सीवेज रीसाइक्लिंग से निकल सकता है रास्ता
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नए जल स्रोत तलाशने से समस्या हल नहीं होगी। इसके लिए जल प्रबंधन, भूजल के इस्तेमाल पर नियंत्रण और सीवेज रीसाइक्लिंग को बड़े स्तर पर लागू करना होगा। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, शहरों से निकलने वाले लगभग 72.36 करोड़ लीटर प्रतिदिन सीवेज में से केवल 20.23 करोड़ लीटर का उपचार हो पाता है। यदि ट्रीट किए गए पानी को बिजली संयंत्रों, डेटा सेंटर और औद्योगिक इकाइयों तक पहुंचाया जाए तो ताजे पानी पर दबाव कम किया जा सकता है। बेहतर नीतियों और रीसाइक्लिंग व्यवस्था से ही खाद्य सुरक्षा बचाते हुए भारत अपने औद्योगिक विकास की रफ्तार बनाए रख सकता है।