ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 भारत की महिला खिलाड़ियों के नाम रहा। भारतीय दल ने कुल 13 गोल्ड मेडल जीते, जिनमें से 8 गोल्ड अकेले महिला खिलाड़ियों ने अपने नाम किए। वेटलिफ्टिंग, पैरा एथलेटिक्स, जूडो और बॉक्सिंग जैसे अलग-अलग खेलों में बेटियों ने शानदार प्रदर्शन कर देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। हर मेडल के पीछे संघर्ष, मेहनत और हिम्मत की ऐसी कहानी छिपी है जिसने पूरे देश को भावुक कर दिया।
मीराबाई और शर्मिला ने दिखाई ताकत
भारत के गोल्डन अभियान की शुरुआत मीराबाई चानू ने महिलाओं के 48 किलोग्राम भार वर्ग में गोल्ड जीतकर की। उन्होंने नया कॉमनवेल्थ गेम्स रिकॉर्ड भी बनाया। इसके बाद पैरा एथलेटिक्स की शॉट पुट F57 स्पर्धा में शर्मिला धनखड़ ने गोल्ड जीतकर देश को दूसरी बड़ी खुशी दी। दो साल की उम्र में पोलियो और निजी जिंदगी की कठिन चुनौतियों का सामना करने वाली शर्मिला ने अपने प्रदर्शन से यह साबित कर दिया कि हौसले के आगे मुश्किलें छोटी पड़ जाती हैं।
अस्मिता की जीत ने रचा नया इतिहास
जूडो की 48 किलोग्राम स्पर्धा में अस्मिता डे ने भारत को पहला कॉमनवेल्थ गोल्ड दिलाकर इतिहास रच दिया। फाइनल मुकाबले में उन्होंने शानदार दांव-पेच और आक्रामक खेल दिखाया। पिछले साल पिता को खोने वाली अस्मिता गोल्ड जीतने के बाद उन्हें याद कर भावुक हो गईं। उनकी जीत ने देशवासियों को गर्व के साथ भावनात्मक पल भी दिया।
बॉक्सिंग में बेटियों का रहा दबदबा
भारतीय महिला मुक्केबाजों ने इस बार रिंग में पूरी तरह अपना दबदबा बनाया। साक्षी चौधरी ने 51 किलो वर्ग, प्रीति पवार ने 54 किलो वर्ग, जैस्मीन लम्बोरिया ने 57 किलो वर्ग और प्रिया घांघस ने 60 किलो वर्ग में गोल्ड मेडल जीतकर भारत का परचम लहराया। प्रिया ने फाइनल में पहले राउंड में पिछड़ने के बाद शानदार वापसी करते हुए मुकाबला अपने नाम किया। उनके परिवार ने बताया कि देशी खाना और चूरमा उनकी पसंदीदा डाइट का हिस्सा है।
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102 डिग्री बुखार में भी जीत लिया गोल्ड
भारत की आठवीं गोल्डन बेटी बनीं अरुंधती चौधरी, जिन्होंने 70 किलो वर्ग के फाइनल में 5-0 से जीत दर्ज की। खास बात यह रही कि उन्होंने 102 डिग्री बुखार होने के बावजूद मुकाबला खेला और गोल्ड मेडल अपने नाम किया। इन आठों बेटियों ने दिखा दिया कि जब इरादे मजबूत हों तो बीमारी, गरीबी और मुश्किल हालात भी सफलता की राह नहीं रोक सकते। यही वजह है कि आज पूरा देश इन चैंपियन बेटियों को सलाम कर रहा है।