Indian Cricket Pitches : भारत में बल्लेबाजों के बल्ले से चौके-छक्कों की बरसात हो रही है, लेकिन दूसरी तरफ गेंदबाजों के लिए विकेट लेना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। अब इस मुद्दे पर मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम के मुख्य पिच क्यूरेटर रमेश म्हामुणकर ने नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि वनडे क्रिकेट में ऐसी पिचें नहीं बननी चाहिए, जहां गेंदबाजों के पास करने के लिए बहुत कम बचता है। उन्होंने यह भी कहा कि बल्लेबाजी के अनुकूल पिचें बनाने के निर्देशों का असर तेज गेंदबाजों और स्पिनरों, दोनों पर पड़ रहा है। इस बहस के बीच हाल में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उतरे कई युवा भारतीय गेंदबाजों के प्रदर्शन पर भी सवाल उठ रहे हैं।
भारतीय पिचों पर बल्लेबाजों का दबदबा क्यों बढ़ रहा है?
नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दो साल में भारत में खेले गए वनडे मुकाबलों में रन बनने की रफ्तार 7.11 रन प्रति ओवर रही, जबकि टी20 अंतरराष्ट्रीय मैचों में यह आंकड़ा 10.66 रन प्रति ओवर बताया गया है। इन आंकड़ों के बीच पिचों के मिजाज को लेकर बहस तेज हुई है। बल्लेबाजी के लिए आसान मानी जाने वाली पिचों पर बड़े स्कोर बनते हैं, लेकिन गेंदबाजों के लिए विकेट निकालना मुश्किल हो सकता है। इसी वजह से सवाल उठ रहा है कि क्या मैदानों पर बल्लेबाजों और गेंदबाजों, दोनों को बराबर मौका मिल रहा है।
डेब्यू करते ही युवा गेंदबाजों की हुई जमकर धुनाई
हाल में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखने वाले कुछ युवा भारतीय गेंदबाजों को अपने शुरुआती मुकाबलों में काफी रन देने पड़े। रिपोर्ट के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर को रणजी ट्रॉफी जिताने में अहम भूमिका निभाने वाले आकिब नबी ने वनडे डेब्यू में 8.5 ओवर में 84 रन दिए और कोई विकेट नहीं लिया। अंशुल कंबोज ने अपने पहले वनडे में 9 ओवर में 82 रन खर्च किए। गुरनूर बराड़ ने दूसरे वनडे में दो विकेट लिए, लेकिन 96 रन भी दिए। वहीं, नीतीश कुमार रेड्डी ने 6.5 ओवर में 50 रन दिए और उन्हें कोई विकेट नहीं मिला। इन आंकड़ों ने पिचों और गेंदबाजी की तैयारी पर चर्चा को हवा दी है।
वानखेड़े के क्यूरेटर बोले- ‘यह क्रिकेट नहीं है’
वानखेड़े स्टेडियम के मुख्य क्यूरेटर रमेश म्हामुणकर ने हिंदुस्तान टाइम्स से बातचीत में कहा कि वनडे क्रिकेट में पूरी तरह बल्लेबाजों के पक्ष में रहने वाली पिचें सही नहीं हैं। उनके मुताबिक, घरेलू क्रिकेट में सुबह के शुरुआती ओवरों में पिच पर नमी रहती है, बाद में बल्लेबाजी आसान होती है और करीब 35 ओवर के बाद स्पिनरों को मदद मिलने लगती है। उन्होंने इसे संतुलित पिच का उदाहरण बताया। म्हामुणकर का मानना है कि टी20 में चौके-छक्के देखने की चाहत के कारण बल्लेबाजी के अनुकूल पिचों को समझा जा सकता है, लेकिन वनडे में गेंदबाजों को भी मदद मिलनी चाहिए।
स्पिनरों को भी नहीं मिल रही पिच से मदद
रमेश म्हामुणकर ने कहा कि समस्या सिर्फ तेज गेंदबाजों तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक, स्पिनरों को भी कई बार पिच से पकड़ और गेंद को घुमाने में मदद नहीं मिलती। उन्होंने बताया कि आईपीएल के दौरान स्पिनर उनसे इस तरह की शिकायत करते हैं। क्यूरेटर का कहना है कि पिच तैयार करने में इस्तेमाल होने वाली मिट्टी और दूसरी सामग्री का सही अनुपात बहुत जरूरी होता है। अगर मुरुम या रेत ज्यादा मिला दी जाए, तो पिच नमी को ठीक से रोक नहीं पाती। इससे मैच के दौरान गेंदबाजों को मिलने वाली मदद पर असर पड़ सकता है।
धोनी ने वानखेड़े की पिच को बताया था बेहतरीन
म्हामुणकर ने बातचीत में यह भी बताया कि महेंद्र सिंह धोनी कई बार उनसे कह चुके हैं कि वानखेड़े की पिच भारत की बेहतरीन पिचों में से एक है। क्यूरेटर के मुताबिक, वहां लाल मिट्टी में सही मात्रा में मुरुम मिलाकर पिच तैयार की जाती है। उनका कहना है कि पिच ऐसी होनी चाहिए, जहां शुरुआत में तेज गेंदबाजों को मदद मिले, बाद में बल्लेबाज रन बना सकें और मैच आगे बढ़ने पर स्पिनरों की भूमिका भी अहम हो। हालांकि, किसी पिच का व्यवहार मौसम, मिट्टी और मैदान की तैयारी जैसे कई पहलुओं पर निर्भर करता है।
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क्या बल्लेबाजों और गेंदबाजों के बीच संतुलन जरूरी है?
पिचों को लेकर उठी यह बहस क्रिकेट के एक बड़े सवाल से जुड़ी है क्या दर्शकों को रोमांचक मुकाबले देने के लिए सिर्फ बड़े स्कोर जरूरी हैं, या गेंदबाजों को भी अपनी काबिलियत दिखाने का मौका मिलना चाहिए? म्हामुणकर का कहना है कि वनडे क्रिकेट में संतुलित पिचें बननी चाहिए, ताकि मुकाबला केवल बल्लेबाजों के पक्ष में न चला जाए। दूसरी ओर, बल्लेबाजी के अनुकूल विकेटों से बड़े स्कोर और तेज खेल देखने को मिलते हैं। आखिरकार, अच्छी पिच वही मानी जाती है, जिस पर बल्लेबाज और गेंदबाज दोनों अपनी क्षमता दिखा सकें और मुकाबला आखिरी तक दिलचस्प बना रहे।