लियोनेल मेसी, लुइस सुआरेज़ और रोड्रिगो डी पॉल का तीन दिन का भारत दौरा खत्म हो चुका है, लेकिन इसने एक बड़ी बहस छेड़ दी है। कोलकाता से लेकर हैदराबाद, मुंबई और दिल्ली तक स्टेडियम खचाखच भरे रहे। आयोजकों ने इस टूर पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च किए, फैंस ने टिकट और सफर में हजारों रुपये झोंक दिए और स्पॉन्सर्स व ब्रॉडकास्टर्स ने भी दिल खोलकर पैसा लगाया। नेता, उद्योगपति और सेलेब्रिटी मेसी के साथ फोटो खिंचवाने के लिए लाइन में खड़े दिखे। सोशल मीडिया पर शोहरत पाने की होड़ मच गई, लेकिन इस चकाचौंध में भारतीय फुटबॉल कहीं गुम हो गया।
अपने ही लीजेंड की पहचान नहीं
इस पूरे तमाशे की सबसे बड़ी विडंबना तब सामने आई, जब भारतीय फुटबॉल के दिग्गज और पूर्व कप्तान बाइचुंग भूटिया को दिल्ली के स्टेडियम में एंट्री के लिए जूझना पड़ा। वह आधिकारिक मेहमान थे, फिर भी सुरक्षा कर्मी उन्हें पहचान नहीं पाए। कई देर बाद एक फोन कॉल से उन्हें मंच तक पहुंचाया गया। यह घटना उस समाज की तस्वीर दिखाती है, जो विदेशी सितारों के आगे झुकता है, लेकिन अपने नायकों को भूल जाता है। यही वजह है कि सुनील छेत्री जैसे भारत के सबसे बड़े गोलस्कोरर को मेसी के दौरे में उतनी सुर्खियां नहीं मिलीं, जितनी अन्य सेलेब्रिटीज़ को।
आईएसएल और आई-लीग को कोई खरीददार नहीं
जहां मेसी के दौरे पर करोड़ों उड़ाए गए, वहीं कुछ हफ्ते पहले भारतीय फुटबॉल के लिए एक चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई। ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन द्वारा इंडियन सुपर लीग के लिए जारी आरएफपी, जिसमें सालाना 37.5 करोड़ रुपये की जरूरत थी, उसे कोई खरीदार नहीं मिला। आई-लीग, जिसकी लागत सिर्फ 4 करोड़ सालाना थी, उसके लिए भी कोई आगे नहीं आया। दिलचस्प बात यह है कि मेसी टूर के दो बड़े स्पॉन्सर JSW और RPSG खुद आईएसएल क्लब चला रहे हैं, जिनका भविष्य अब अनिश्चितता में है।
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फैंस हैं, पैसा है, पर भरोसा नहीं
मेसी को देखने के लिए फैंस ने 4,000 रुपये से ज्यादा खर्च किए, लेकिन आईएसएल मैचों के 100–300 रुपये के टिकटों पर भी दर्शक कम हो रहे हैं। क्लब हर साल करीब 60 करोड़ खर्च करते हैं और 25 करोड़ तक का नुकसान झेलते हैं। अब न आईएसएल की शुरुआत की तारीख तय है, न आई-लीग की। सवाल साफ है—क्या हमें फुटबॉल से प्यार है, या सिर्फ सोशल मीडिया की शोहरत से? मेसी चले गए, वीडियो और तस्वीरें रह जाएंगी, लेकिन भारतीय फुटबॉल वहीं खड़ा है—एक ठहरे हुए मोड़ पर। शायद अब वक्त है कि हम सिर्फ फुटबॉल देखने नहीं, उसे जिंदा रखने की भी बात करें।