Indian Rupee Fall 2026 : भारतीय रुपये की गिरावट ने सरकार और बाजार की चिंता बढ़ा दी है। साल 2026 में अब तक रुपया अपनी करीब 6 फीसदी कीमत गंवा चुका है। खबर के मुताबिक, डॉलर के मुकाबले लगातार तीन कारोबारी सत्रों में गिरावट के बाद यह एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसी बन गया है। मई में रुपया एक समय 96.96 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया था। इस बीच भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने सरकार को सलाह दी है कि रुपये की गिरावट देखकर घबराने के बजाय लंबी अवधि के असर पर ध्यान देना चाहिए।
तीन सत्रों में 77 पैसे की गिरावट
डॉलर के मुकाबले रुपये पर दबाव लगातार बना हुआ है। खबर के अनुसार, तीन कारोबारी सत्रों में भारतीय करेंसी 77 पैसे कमजोर हुई। मंगलवार को शुरुआती कारोबार में रुपया 95.22 प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच गया। यह गिरावट ऐसे समय में हुई है, जब भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर मजबूत बताई जा रही है। इस साल अब तक रुपये की कीमत में करीब 6 फीसदी की कमी आई है। कमजोर रुपये से आयात महंगा हो सकता है, जिसका असर कारोबार और आम लोगों की जेब पर भी पड़ सकता है।
रघुराम राजन ने दी घबराने से बचने की सलाह
आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने रॉयटर्स ग्लोबल मार्केट्स फोरम में रुपये की गिरावट पर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि सबसे पहले घबराने से बचना चाहिए। राजन के मुताबिक, किसी एक तय स्तर को बचाने के लिए जल्दबाजी में कदम उठाने के बजाय यह देखना जरूरी है कि मौजूदा हालात पहले की परिस्थितियों से कितने अलग हैं। उनका मानना है कि रुपये का कमजोर होना हर स्थिति में नुकसानदायक नहीं होता। इससे भारतीय सामान विदेशी बाजारों में अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकते हैं और निर्यात को सहारा मिल सकता है।
महंगे तेल से बढ़ सकता है दबाव
रघुराम राजन ने चेतावनी दी कि अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो भारत का चालू खाता घाटा बढ़ सकता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। तेल महंगा होने पर आयातकों को ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ती है। इससे रुपये पर दबाव बढ़ता है। पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ने और खाड़ी देशों के ऊर्जा ढांचे को नुकसान पहुंचने की स्थिति में तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसका असर भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों पर पड़ सकता है।
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विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी वजह
रुपये की कमजोरी के पीछे विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी एक बड़ी वजह बताई जा रही है। खबर के मुताबिक, 2026 की शुरुआत से विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 30 अरब डॉलर से ज्यादा की निकासी की है। सोमवार को विदेशी संस्थागत निवेशकों ने 1,462.49 करोड़ रुपये के शेयर बेचे। इसके अलावा आयात पर निर्भरता, महंगाई और विदेशी पूंजी की जरूरत जैसी पुरानी चुनौतियां भी रुपये पर दबाव बढ़ाती हैं। अमेरिका की ओर से भारतीय सामान पर लगाए गए शुल्क ने भी व्यापार और कंपनियों की कमाई को लेकर निवेशकों की चिंता बढ़ाई थी।
सरकार के सामने लंबी अवधि की चुनौती
रघुराम राजन के मुताबिक, रुपये के किसी एक खास स्तर को बचाने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार का तेजी से इस्तेमाल करना समझदारी नहीं होगी। उन्होंने FCNR(B) के जरिए जुटाई गई रकम का जिक्र करते हुए कहा कि इसे जल्दबाजी में किसी एक स्तर को बचाने के लिए खर्च करना सही कदम नहीं होगा। भारतीय रिजर्व बैंक बाजार में जरूरत के मुताबिक दखल देकर रुपये में तेज उतार-चढ़ाव कम कर सकता है। हालांकि, लंबे समय तक रुपये को स्थिर रखने के लिए तेल की कीमतों, महंगाई, निर्यात और विदेशी निवेश को लेकर चुनौतियों से निपटना जरूरी होगा।