सप्ताह के पहले कारोबारी दिन भारतीय मुद्रा को बड़ा झटका लगा। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। कारोबार के दौरान रुपया 96.283 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड स्तर तक फिसल गया। कुछ समय के लिए यह 96.18 के आसपास भी पहुंचा। इससे पहले बना रिकॉर्ड स्तर भी टूट गया। इस गिरावट ने बाजार और आम लोगों दोनों की चिंता बढ़ा दी है।
तेल ने बढ़ाया दबाव
रुपये की कमजोरी के पीछे सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों को माना जा रहा है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है तो आयात के लिए ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ती है। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होने लगता है। यही वजह है कि तेल और रुपये का रिश्ता सीधे तौर पर जुड़ा माना जाता है।
वैश्विक तनाव का असर
मध्य पूर्व से जुड़ी खबरों और अंतरराष्ट्रीय तनाव का असर भी बाजारों पर दिखाई दे रहा है। वैश्विक अनिश्चितता बढ़ने पर निवेशक सुरक्षित निवेश की ओर रुख करते हैं। ऐसे समय में अमेरिकी डॉलर को सुरक्षित विकल्प माना जाता है। निवेशकों के डॉलर की ओर जाने से दूसरे देशों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ जाता है और इसका असर भारतीय रुपये पर भी दिखाई देता है।
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शेयर बाजार पर भी असर
रुपये की कमजोरी सिर्फ विदेशी मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं रहती। इसका असर शेयर बाजार और निवेश माहौल पर भी पड़ सकता है। विदेशी निवेशक अगर भारतीय बाजार से पैसा निकालते हैं तो बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। लगातार कमजोरी निवेशकों की चिंता भी बढ़ा सकती है। इसलिए बाजार की नजर अब आगे के आर्थिक संकेतों पर बनी हुई है।
आम आदमी पर क्या असर
रुपये की कमजोरी का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है। विदेश यात्रा, पढ़ाई और इलाज जैसे खर्च बढ़ सकते हैं। विदेश से आने वाले मोबाइल, लैपटॉप और इलेक्ट्रॉनिक सामान भी महंगे हो सकते हैं। कई कंपनियों के आयात खर्च बढ़ने से कीमतों पर असर दिख सकता है। यानी इसका असर धीरे-धीरे रोजमर्रा की जिंदगी तक पहुंच सकता है।
आगे क्या हो सकता है
अब सभी की नजर सरकार और आर्थिक संस्थाओं के अगले कदम पर है। बाजार विशेषज्ञ मानते हैं कि वैश्विक हालात और तेल की कीमतों पर आगे की दिशा निर्भर करेगी। फिलहाल रुपया दबाव में दिखाई दे रहा है और अगर अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां नहीं सुधरीं तो आने वाले दिनों में बाजार की चिंता और बढ़ सकती है।