Indian Rupee Falls : भारतीय मुद्रा पर एक बार फिर दबाव देखने को मिला है। 9 सितंबर 2026 को कारोबार के दौरान रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 34 पैसे कमजोर होकर 95.08 के अस्थायी स्तर पर बंद हुआ। कारोबार के दौरान यह 95.22 के निचले स्तर तक भी पहुंच गया था। रुपये की इस कमजोरी के पीछे सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतों में आया तेज उछाल माना जा रहा है। ब्रेंट क्रूड छह सप्ताह में पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया।
कच्चे तेल ने बढ़ाई रुपये की मुश्किल
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव और पश्चिम एशिया में तेल सुविधाओं तथा जहाजों पर हमलों ने वैश्विक आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इसके असर से ब्रेंट क्रूड करीब 2.94 प्रतिशत चढ़कर 100.73 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में तेल महंगा होने पर देश का आयात बिल बढ़ सकता है और डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये पर दबाव और गहरा सकता है।
शेयर बाजार की गिरावट से दबाव
रुपये की कमजोरी को घरेलू शेयर बाजार में हुई तेज बिकवाली ने भी बढ़ाया। बुधवार को सेंसेक्स 813.35 अंक टूटकर 74,764.23 पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी 203.60 अंक गिरकर 23,431.50 के स्तर पर पहुंच गया। बाजार में विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी रुपये के लिए चिंता बढ़ा रही है। एक्सचेंज के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी संस्थागत निवेशकों ने मंगलवार को शुद्ध आधार पर 123.19 करोड़ रुपये के शेयर बेचे थे।
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94.80 से शुरू होकर 95.22 तक गिरा
इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया डॉलर के मुकाबले 94.80 पर खुला, जो दिन का उसका मजबूत स्तर भी रहा। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के बीच घरेलू मुद्रा कमजोर होती गई और 95.22 के निचले स्तर तक पहुंच गई। अंत में रुपया 95.08 के अस्थायी स्तर पर बंद हुआ। इससे पहले मंगलवार को डॉलर के मुकाबले रुपया 94.74 पर बंद हुआ था। वहीं डॉलर सूचकांक 98.84 पर कारोबार कर रहा था।
महंगाई और ब्याज दर पर असर
विश्लेषकों के मुताबिक, यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो रुपये के साथ देश की महंगाई पर भी दबाव बढ़ सकता है। महंगा आयात घरेलू कीमतों को प्रभावित कर सकता है, जिससे आयातित महंगाई का खतरा बढ़ेगा। मिरे एसेट शेयरखान के शोध विश्लेषक अनुज चौधरी के मुताबिक, वैश्विक बाजार में जोखिम से बचने की प्रवृत्ति और महंगे कच्चे तेल के कारण रुपये का रुख कमजोर रह सकता है। ऐसे माहौल में आगामी मौद्रिक नीति में ब्याज दरों में कटौती की संभावनाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।