भारत का एविएशन सेक्टर इन दिनों बड़ी परीक्षा से गुजर रहा है। इंडिगो की हजारों फ्लाइट कैंसिल होने से यात्रियों की मुश्किलें बढ़ीं और साथ ही एक बड़ा खतरा भी सामने आया—डुओपोली। घरेलू बाजार में इंडिगो और टाटा ग्रुप की एयर इंडिया मिलकर 92% तक मार्केट कंट्रोल करते हैं। यानी, अगर इनमें से किसी एक में भी टकराव या संकट आता है तो पूरा सेक्टर हिल जाता है। यह स्थिति बिल्कुल वैसी है जैसी कुछ साल पहले टेलीकॉम में हुई थी, जब वोडाफोन–आइडिया के डूबने का खतरा बढ़ गया था और बाजार सिर्फ जियो–एयरटेल में सिमटता दिख रहा था।
टेलीकॉम में सरकार ने कैसे बचाया था संतुलन?
2016 के बाद जियो की आक्रामक एंट्री से कई कंपनियां बाजार छोड़ गईं। वोडाफोन–आइडिया भारी कर्ज में डूब गई और एक समय ऐसा आया जब इसके बचे रहने की उम्मीद भी खत्म होती दिखी। लेकिन दो-कंपनी के दबदबे को रोकने के लिए सरकार ने बड़ा कदम उठाया AGR बकाया पर लगे ब्याज को इक्विटी में बदलकर Vi में 33% हिस्सेदारी ले ली। इससे बाजार में प्रतिस्पर्धा बनी रही और किराए व सेवाओं में मनमानी पर रोक लगी। यह कदम सीधे बेलआउट नहीं था, लेकिन सेक्टर की स्थिरता बनाए रखने के लिए सरकार का महत्वपूर्ण हस्तक्षेप था।
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क्या एविएशन में दोहराया जा सकता है ?
एविएशन सेक्टर टेलीकॉम से काफी अलग है। एयरलाइंस कम मुनाफे पर चलती हैं, ईंधन की कीमतों और डॉलर की दरों पर निर्भर रहती हैं और बहुत बड़ा संचालन खर्च होता है। जेट एयरवेज और गो फर्स्ट बंद होने के बाद बाजार लगभग दो दिग्गजों पर टिक गया है। ऐसे में सरकार सीधा वित्तीय हस्तक्षेप करने से बचना चाहती है। लेकिन इंडिगो की पायलट कमी और बड़े पैमाने पर कैंसिलेशन ने संकेत दिया है कि यदि बड़ा खालीपन बना तो बाजार की स्थिरता प्रभावित होगी। इसलिए सरकार अब नियामक कदमों के जरिए संतुलन साधने की कोशिश कर रही है।
सरकार के ‘तरकश’ में कौन-कौन से तीर?
सूत्रों के अनुसार DGCA इंडिगो को फरवरी तक रोजाना 300 उड़ानें कम करने का आदेश दे सकती है, ताकि नेटवर्क स्थिर हो सके और छोटी एयरलाइंस को जगह मिले। साथ ही केंद्र सरकार ने एयर इंडिया, अकासा और स्पाइसजेट से उड़ानें बढ़ाने के लिए कहा है ताकि बढ़ी मांग संभाली जा सके। भविष्य में छोटे ऑपरेटर्स को बेड़े विस्तार हेतु मदद, नए खिलाड़ियों को तेज मंजूरी और UDAN योजना को मजबूत करने जैसे कदम भी संभव हैं। सरकार सीधे एयरलाइन नहीं खरीदेगी, लेकिन नियमन के जरिए बाजार में प्रतिस्पर्धा बनाए रखने की दिशा में आगे बढ़ती दिख रही है।