मध्य प्रदेश के इंदौर में दूषित पानी से हुई 16 मौतों ने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है। भागीरथपुरा इलाके में मातम पसरा है और हर घर डर के साए में जी रहा है। इस बीच एक ऐसा खुलासा सामने आया है, जिसने सिस्टम की लापरवाही को बेनकाब कर दिया है। चौंकाने वाली बात यह है कि सालों पहले ही भूजल को पीने लायक नहीं माना जा चुका था, बावजूद इसके कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
बरसों पहले चेतावनी, फिर भी अनदेखी
इंदौर में दूषित पानी का यह संकट अचानक पैदा नहीं हुआ। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा वर्ष 2018 में किए गए एक सर्वे में साफ तौर पर चेतावनी दी गई थी कि शहर का भूजल पीने योग्य नहीं है। 60 स्थानों से लिए गए सैंपल में से 59 सैंपल दूषित पाए गए थे। इसके बाद भी हालात जस के तस बने रहे और चेतावनियां फाइलों में दबी रह गईं।
नगर निगम को लिखे गए थे कई पत्र
जानकारी के अनुसार, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 2022 तक तीन बार नगर निगम और सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड को पत्र लिखकर भूजल के उपयोग पर रोक लगाने की सलाह दी थी। इन पत्रों में साफ कहा गया था कि दूषित पानी से गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा हो सकता है, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
पुराने सैंपल, देर से आई रिपोर्ट
बोर्ड ने 2016-17 और 2017-18 के दौरान पानी के सैंपल एकत्र किए थे, जिनकी रिपोर्ट 2019 में सामने आई। रिपोर्ट में इंडस्ट्रियल इलाकों के भूजल को खास तौर पर खतरनाक बताया गया। आरोप है कि कई जगहों पर औद्योगिक कचरा सीधे ड्रेनेज में छोड़ा जा रहा है, जिससे भूजल लगातार जहरीला होता चला गया।
बैक्टीरिया बना जानलेवा
पानी की जांच में टोटल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया पाए जाने की पुष्टि हुई थी। यह बैक्टीरिया पेट और आंतों को गंभीर नुकसान पहुंचाता है, जिससे डायरिया और अन्य घातक बीमारियां फैलती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ड्रेनेज का गंदा पानी ही इस संक्रमण का मुख्य स्रोत हो सकता है।
भागीरथपुरा ही नहीं, अन्य इलाके भी प्रभावित
सिर्फ भागीरथपुरा ही नहीं, बल्कि कान्ह नदी के आसपास के क्षेत्रों में भी दूषित पानी की समस्या सामने आई थी। अवैध उद्योगों और वेस्ट मैनेजमेंट की कमी ने हालात और बिगाड़ दिए।