इकरा हसन ने छोड़ दिया सबको पीछे, अखिलेश से भी एक कदम आगे निकलकर उन्होंने ऐसा दांव खेला जिसने संसद से लेकर सियासी गलियारों तक हलचल मचा दी है. जी हां, ये सच है क्योंकि जहां एक तरफ उनकी ही पार्टी के नेता मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग आरक्षण की मांग कर रहे थे, वहीं इकरा ने इस मुद्दे को और बड़ा बनाते हुए सभी धार्मिक अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए कोटा देने की मांग कर दी. इस बयान ने साफ कर दिया कि वह सिर्फ सीमित राजनीति नहीं बल्कि बड़ा सियासी संदेश देने की कोशिश कर रही हैं.
लोकसभा में क्या बोलीं इकरा
लोकसभा में ‘नारी शक्ति वंदन’ अधिनियम और परिसीमन को लेकर बोलते हुए इकरा हसन ने सरकार पर सीधा हमला बोला. उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण का मुद्दा अब केवल आरक्षण तक सीमित नहीं है बल्कि इसे चुनावी फायदे के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जनगणना और परिसीमन की आड़ में महिलाओं के अधिकारों को टाल रही है. इकरा ने यह भी सवाल उठाया कि पहले 2034 और अब 2029 की बात क्यों की जा रही है, आखिर यह बदलाव किस आधार पर हो रहा है.
कोटे में कोटा की मांग
इकरा हसन का सबसे बड़ा बयान ‘कोटे में कोटा’ को लेकर आया. उन्होंने साफ कहा कि ओबीसी, अल्पसंख्यक और गरीब वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से उप-आरक्षण होना चाहिए. इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि चुनाव लड़ने वाली गरीब और वंचित वर्ग की महिलाओं को राज्य की तरफ से आर्थिक मदद दी जानी चाहिए. इस मांग ने पूरे बहस को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया, क्योंकि अब यह मुद्दा सिर्फ धर्म या जाति नहीं बल्कि आर्थिक और सामाजिक आधार पर भी फैल गया है.
अखिलेश से आगे निकलीं इकरा?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इकरा हसन का यह बयान उन्हें अपनी ही पार्टी में अलग पहचान दिला सकता है. जहां अखिलेश यादव और अन्य नेता मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग आरक्षण की बात कर रहे थे, वहीं इकरा ने सभी अल्पसंख्यकों को जोड़कर एक व्यापक दायरा बना दिया. यही वजह है कि उनके इस कदम को ‘स्मार्ट मूव’ कहा जा रहा है. चर्चा यह भी है कि पार्टी के भीतर भी इस बयान को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है और कई नेता इसे आगे बढ़ाने की बात कर रहे हैं.
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बढ़ी सियासी हलचल
इकरा हसन के इस बयान के बाद सियासत और गरमा गई है. एक तरफ सरकार इस मांग को असंवैधानिक बता रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इसे सामाजिक न्याय के नजरिए से देख रहा है. कुल मिलाकर इकरा ने एक ऐसा मुद्दा उठा दिया है जिसने महिला आरक्षण की बहस को नया मोड़ दे दिया है. आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह दांव सिर्फ बयान तक सीमित रहता है या फिर राजनीति में कोई बड़ा बदलाव भी लेकर आता है.