मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव और युद्ध जैसे हालात के बीच कूटनीतिक समीकरण लगातार बदलते नजर आ रहे हैं। ईरान और अमेरिका के बीच वार्ता अभी तक किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाई है, वहीं पाकिस्तान की मध्यस्थता भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं। ईरानी नेताओं के बयान, ट्रम्प की सख्त चेतावनी और होर्मुज जैसे रणनीतिक मुद्दों ने पूरे क्षेत्र में अस्थिरता और अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है।
पाकिस्तान की मध्यस्थता पर ईरान का सवाल
ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के प्रवक्ता ने पाकिस्तान की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान भले ही दोस्त है, लेकिन वह निष्पक्ष मध्यस्थ नहीं बन सकता क्योंकि वह अक्सर अमेरिका और डोनाल्ड ट्रम्प के पक्ष में झुकाव दिखाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मध्यस्थ वही हो सकता है जो दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखे।
कूटनीतिक दौरे और तेज होती गतिविधियां
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची हाल ही में पाकिस्तान, ओमान और रूस के दौरे पर रहे। इन दौरों का उद्देश्य युद्ध और तनाव को कम करने के लिए संभावित बातचीत की जमीन तैयार करना बताया गया है। हालांकि इस्लामाबाद में हुई बातचीत से कोई ठोस परिणाम नहीं निकल सका, जिससे कूटनीतिक गतिरोध बना हुआ है।
ट्रम्प की चेतावनी से बढ़ा दबाव
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को सीजफायर पर सहमत होने के लिए केवल तीन दिन का अल्टीमेटम दिया है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समझौता नहीं हुआ तो तेल पाइपलाइन में गंभीर नुकसान हो सकता है। उनके बयान ने वैश्विक ऊर्जा बाजार और राजनीतिक हलकों में चिंता बढ़ा दी है।
न्यूक्लियर और होर्मुज पर ईरान का सख्त रुख
ईरान ने साफ कर दिया है कि उसका न्यूक्लियर कार्यक्रम और होर्मुज स्ट्रेट उसके लिए “रेड लाइन” हैं और इन पर कोई समझौता संभव नहीं है। हालांकि रिपोर्टों के अनुसार ईरान ने अस्थायी रूप से होर्मुज खोलने का प्रस्ताव देकर तनाव कम करने की कोशिश भी की है, लेकिन अंदरूनी मतभेद अब भी बने हुए हैं।
वैश्विक बाजारों पर असर और बढ़ती उम्मीदें
तनाव और शांति वार्ता की खबरों के बीच वैश्विक बाजारों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला। एशियाई टेक शेयरों में तेजी आई जबकि भारत के शेयर बाजारों में भी मजबूती दर्ज की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज को लेकर किसी भी सकारात्मक संकेत से ऊर्जा बाजार में स्थिरता आ सकती है।